Friday, September 4, 2026
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संकल्पों की गाड़ी से सफलता की मंजिल तक

संकल्पों की गाड़ी से सफलता की मंजिल तक

✍️लेखक : परमानन्द गोयल कोटा (राजस्थान)

सफलता की राह कोई सीधा राजमार्ग (Highway) नहीं है। यह एक ऐसा जीवन-पथ है जिस पर चलना सब चाहते हैं, पर टिकते वही हैं जिनके पास सही सवारी है।

इस रास्ते पर जगह-जगह मुश्किलों के गड्ढे हैं, भ्रम और असमंजस के चौराहे हैं, रिश्ते-नातों के स्पीड ब्रेकर हैं, कहीं निराशा की गहरी ढलान है तो कहीं जिम्मेदारियों की ऊँची चढ़ाई। इन्हीं कारणों से बहुत लोग रास्ते में ही थक कर बैठ जाते हैं।

👉पर जो मंजिल तक पहुँचते हैं, उनके पास एक खास गाड़ी होती है। वह है संकल्पों की गाड़ी।

👉इस गाड़ी को चलाने वालों की दो सच्ची कहानियाँ

✅1. पहाड़ से भी बड़ा संकल्प – दशरथ मांझी की कहानी

बिहार के एक गरीब मजदूर दशरथ मांझी के रास्ते में भी एक बहुत बड़ा गड्ढा आया। उनकी पत्नी की तबीयत बिगड़ी और पहाड़ के कारण अस्पताल ले जाने में देर हो गई और वह चल बसीं। यह निराशा की सबसे गहरी ढलान थी।

अधिकतर लोग वहीं रुक जाते। पर मांझी ने संकल्प की गाड़ी उठाई। उनके पास न पैसे थे, न मशीन। सिर्फ हौसलों के पहिए, श्रम का ईंधन और कर्म का इंजन था। 22 साल तक अकेले छेनी-हथौड़े से उन्होंने पहाड़ काटकर 110 मीटर लंबा रास्ता बना दिया। जो काम सरकार नहीं कर सकी, वह एक आदमी के संकल्प ने कर दिया।

✅2. टूल बॉक्स की ताकत – थॉमस एडिसन की कहानी

जब एडिसन बिजली का बल्ब बना रहे थे, तो 1000 बार फेल हुए। लोगों ने कहा, आप तो असफल हो गए। एडिसन ने कहा, मैं असफल नहीं हुआ, मैंने 1000 ऐसे तरीके खोजे हैं जो काम नहीं करते।

उनके टूल बॉक्स में आशा और धैर्य था। हर पंचर के बाद उन्होंने गाड़ी रोकी नहीं, टायर बदला और फिर चल पड़े। 1001वीं बार में रोशनी हुई और पूरी दुनिया रोशन हो गई।

✅विज्ञान क्या कहता है?

इस बात को विज्ञान भी सही मानता है। मनोवैज्ञानिक एंजेला डकवर्थ ने वर्षों तक शोध करके बताया कि सफलता का सबसे बड़ा कारण न तो IQ है, न किस्मत, बल्कि धैर्य के साथ दृढ़ संकल्प है।

एक और अध्ययन में पाया गया कि जो लोग अपने संकल्प और लक्ष्य को सिर्फ मन में नहीं, कागज पर लिख लेते हैं, उनके सफल होने की संभावना 42% तक बढ़ जाती है। यानी संकल्प की गाड़ी को जब लिखकर पक्का कर लिया जाता है, तो बुद्धि रूपी ड्राइवर उसे और बेहतर चलाता है।

✅तो इस गाड़ी के पुर्जे फिर से देख लीजिए

✅हौसलों के पहिए: जो गड्ढों से निकालते हैं।

✅श्रम का ईंधन: जो रोज भरना पड़ता है।

✅कर्म का इंजन: जो दिशा और शक्ति देता है।

✅विश्वास का स्टेयरिंग: जो चौराहों पर भटकने से बचाता है।

✅्उत्साह का एक्सीलेटर: जो चढ़ाई पर चढ़ने की ताकत देता है।

✅और टूल बॉक्स में रखे आशा, धैर्य और इच्छा के औजार, जो हर पंचर में काम आते हैं।

✅अंत में ड्राइवर तो बुद्धि ही है, जो तय करती है कि कब रुकना है, कब चलना है।

✅जब यह पूरी गाड़ी तैयार हो, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं। आप भी इस गाड़ी के सारथी बनें। रास्ता कठिन जरूर है, पर नामुमकिन नहीं।

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