कलेक्ट्रेट परिसर में आवारा पशुओं का कब्जा! सरकारी दफ्तरों के बीच खुलेआम घूम रहे जानवर, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
कोटा। शहर में आवारा पशुओं की समस्या अब केवल सड़कों और बाजारों तक सीमित नहीं रह गई है। इसका एक चिंताजनक दृश्य कोटा के जिला कलेक्ट्रेट परिसर में भी देखने को मिला, जहां बरामदे और आने-जाने वाले रास्ते में आवारा जानवर बैठे नजर आए। कलेक्ट्रेट परिसर में प्रतिदिन बड़ी संख्या में आमजन के साथ अधिकारी-कर्मचारियों की आवाजाही रहती है। इसके अलावा परिसर और आसपास कई महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय, न्यायालय तथा पुलिस चौकी भी मौजूद हैं। ऐसे स्थान पर आवारा पशुओं का खुलेआम घूमना व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े करता है।
सरकारी परिसर में ही आवारा पशुओं की मौजूदगी
कलेक्ट्रेट परिसर में आवारा जानवरों के बैठे होने का दृश्य सामने आने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जिला प्रशासन के प्रमुख कार्यालय परिसर में ही आवारा पशुओं को रोकने या हटाने की प्रभावी व्यवस्था नजर नहीं आ रही, तो शहर की आम सड़कों पर स्थिति क्या होगी।
बरामदे में रास्ते के बीच बैठे जानवरों के कारण लोगों को आवागमन में परेशानी हो सकती है। यदि कोई पशु अचानक आक्रामक हो जाए या किसी व्यक्ति की ओर दौड़ पड़े, तो दुर्घटना की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
पहले भी कलेक्ट्रेट परिसर में हो चुका है डॉग अटैक
यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जनवरी 2026 में कोटा के नयापुरा से कलेक्ट्रेट क्षेत्र तक आवारा कुत्तों के हमले की बड़ी घटना सामने आई थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, उस दौरान 20 से 30 से अधिक लोग कुत्तों के हमले में घायल हुए थे। घायलों में कलेक्ट्रेट में कार्यरत नायब तहसीलदार भी शामिल थे। घायलों को उपचार के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा और एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगाए गए।
इस घटना के बाद आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर नगर निगम और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे थे। ऐसे में वर्तमान में कलेक्ट्रेट परिसर में फिर आवारा जानवरों की मौजूदगी सामने आना चिंता का विषय है।
नगर निगम की कार्रवाई पर सवाल
नगर निगम की जिम्मेदारी शहर में आवारा पशुओं और श्वानों से संबंधित समस्या के प्रबंधन की दिशा में प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करने की है।
हालांकि, कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण सरकारी परिसर में आवारा जानवरों का पहुंचना यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि पशु नियंत्रण, रेस्क्यू और निगरानी की व्यवस्था जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी है।
यह भी जरूरी है कि इस समस्या का समाधान केवल जानवरों को एक स्थान से पकड़कर दूसरे स्थान पर छोड़ने तक सीमित न रहे। शहर में लगातार बढ़ रही समस्या को देखते हुए स्थायी और नियमसम्मत व्यवस्था, नियमित निगरानी तथा संवेदनशील स्थानों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
अब सवाल जिम्मेदारी का
कलेक्ट्रेट परिसर में आवारा जानवरों की मौजूदगी का वीडियो या तस्वीरें सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जिला प्रशासन के प्रमुख कार्यालयों वाला परिसर भी आवारा पशुओं से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?
जरूरत इस बात की है कि नगर निगम और प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कलेक्ट्रेट परिसर सहित शहर के संवेदनशील स्थानों पर आवारा पशुओं की प्रभावी रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाएं, ताकि किसी अप्रिय घटना का इंतजार न करना पड़े।
सवाल सीधा है—सरकारी परिसर में आवारा पशु पहुंच रहे हैं, तो इन्हें रोकने और हटाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?










