Friday, August 7, 2026
Screenshot_2026-02-16-14-04-33-20_6012fa4d4ddec268fc5c7112cbb265e7
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

सम्यग्दर्शन का प्रथम सोपान ‘निःशंकित अंग’, अटूट श्रद्धा ही मोक्षमार्ग का प्रथम द्वार : निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज

रत्नकरण्ड श्रावकाचार के गूढ़ तत्वों का सरल विवेचन; देव, शास्त्र और गुरु के प्रति निष्कंप श्रद्धा को बताया आत्मकल्याण का आधार

कोटा/श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में आध्यात्मिक ज्ञान की अविरल गंगा प्रवाहित हुई। आचार्य समन्तभद्र स्वामी विरचित ग्रंथराज रत्नकरण्ड श्रावकाचार के क्रमिक वाचन में श्लोक क्रमांक 11 का अत्यंत सरल, मार्मिक एवं तत्त्वज्ञानपूर्ण विवेचन करते हुए मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन का प्रथम अंग “निःशंकित अंग” है, अर्थात् सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति बिना किसी शंका के अटूट श्रद्धा रखना ही आत्मकल्याण एवं मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी है।

मुख्य संयोजक – चातुर्मास 2026 श्री हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर जिनवाणी का श्रवण किया तथा सम्यग्दर्शन के प्रथम अंग का गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य समझा।

________________________________________

निःशंकित श्रद्धा ही सम्यग्दर्शन का प्रथम अंग

मुनिश्री ने कहा कि आचार्य समन्तभद्र स्वामी स्पष्ट करते हैं कि जिनवाणी, आगम और सच्चे गुरु का स्वरूप जैसा है, वैसा ही स्वीकार करना चाहिए; उसमें किसी प्रकार का संशय नहीं होना चाहिए। तलवार की धार पर टिके जल के समान अडिग, निष्कंप और अविचल श्रद्धा ही “निःशंकित अंग” कहलाती है।

उन्होंने कहा कि सच्चे देव, शास्त्र और गुरु द्वारा प्रतिपादित धर्म के प्रति यह दृढ़ विश्वास होना चाहिए कि “तत्त्व यही है, ऐसा ही है और इससे भिन्न कुछ भी नहीं।” श्रद्धा में किसी प्रकार का संशय या भ्रम सम्यग्दर्शन में बाधक बनता है।

________________________________________

आप्तवाणी और गुरु परंपरा ही सन्मार्ग का वास्तविक स्वरूप

मुनिश्री ने कहा कि संसार रूपी भवसागर से पार होने के लिए जिन सत्पुरुषों ने जिस मार्ग का अनुसरण किया, वही वास्तविक सन्मार्ग है। यही आप्तवाणी, आगम और गुरु परम्परा का अखंड प्रवाह है।

उन्होंने कहा कि जिनधर्म में निष्कंप श्रद्धा रखने वाला साधक अज्ञान, मोह और भ्रम से मुक्त होकर आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर होता है। जिस प्रकार चोर भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर निरंजन बन सकता है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव भी देव, शास्त्र, गुरु तथा सप्ततत्त्वों के प्रति निःशंक श्रद्धा रखकर आत्मोन्नति कर सकता है।

________________________________________

आत्मा और शरीर का भेदज्ञान ही मोक्षमार्ग का आधार

अपने ओजस्वी प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि शरीर और आत्मा दोनों भिन्न हैं। इस भेद-विज्ञान को समझे बिना मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ना संभव नहीं।

उन्होंने कहा कि जब साधक सप्त प्रकार के भय से ऊपर उठकर धर्मायतनों में निष्कंप श्रद्धा रखता है, तभी सम्यग्दर्शन का प्रथम अंग प्राप्त होता है। पहले श्रद्धा दृढ़ होती है, उसके बाद ही साधना सफल होती है और मोक्षमार्ग प्रशस्त होता है।

________________________________________

अतिविशिष्ट श्रद्धालुओं का हुआ आत्मीय स्वागत, भक्ति से गुंजायमान रहा मंदिर परिसर

धर्मसभा में बाहर से पधारे अतिविशिष्ट श्रद्धालु श्री संजय निर्वाण, श्री पारस सोगानी (पूर्व अध्यक्ष, खंडेलवाल समाज) एवं इंजीनियर श्री राजेन्द्र जैन ने परम पूज्य मुनिश्री के श्रीचरणों में श्रीफल अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।

तत्पश्चात चातुर्मास स्वागत समिति द्वारा सभी अतिथियों का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।

चातुर्मास प्रवचनमाला के अंतर्गत श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पूजन, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी वंदना एवं विविध धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया। सम्पूर्ण मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, गुरुभक्ति और जिनवाणी के मंगलमय स्वरों से गुंजायमान रहा।

________________________________________

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, श्री हुकम जैन ‘काका’, श्री प्रकाश हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।

निर्माण मंत्री सुनील माडिया बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री कैलाशचंद जी, श्री चंद्रप्रकाश जी, श्री मुकेश जी, श्री चिराश जी, श्री महिमा जी एवं समस्त ठग परिवार (आंवा वाले), वसंत विहार, कोटा द्वारा अपनी सुपुत्री कु. देशना जैन के जन्मदिवस के पावन उपलक्ष्य में श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री वीरेन्द्र जी, श्री जगदीश जी, श्रीमती शीतल जैन एवं समस्त परिवार, तलवंडी द्वारा प्राप्त किया गया।

उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी के आहारदान का सौभाग्य सुधा जी चंबल डेयरी परिवार को तथा क्षुल्लक श्री संयम सागर जी के आहारदान का सौभाग्य श्री अशोक जी पाटनी एवं श्रीमती सुशीला जी पाटनी R K MARBEL परिवार को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती मोना माडिया एवं श्रीमती सीमा शाह द्वारा संयुक्त रूप से सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के अंत में श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभावपूर्वक आचार्यश्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

________________________________________

🌼 गुरुवाणी के अमृत संदेश 🌼

🔸 सम्यग्दर्शन का प्रथम अंग निःशंकित श्रद्धा है।

🔸 देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अटूट विश्वास ही आत्मकल्याण का आधार है।

🔸 आत्मा और शरीर का भेदज्ञान मोक्षमार्ग का प्रथम सोपान है।

🔸 श्रद्धा में संशय नहीं, दृढ़ विश्वास ही साधना को सफल बनाता है।

🔸 आप्तवाणी, आगम और गुरु परंपरा का अनुसरण ही सच्चा सन्मार्ग है।

🔸 पहले श्रद्धा दृढ़ करें, फिर साधना करें—तभी मोक्षमार्ग प्रशस्त होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles