Sunday, April 19, 2026
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काव्य- जिंदगी का सफ़र✍बी.एल.गॊठवाल

#नमन मंच बज्म-ए-रोशन

#विषय:”जिंदगी का सफ़र”

#विधा:काव्य

 

“जिंदगी का सफ़र”,यों गुजरता रहा।

इनायत रब की , मैं संवरता रहा।

तरुणाई ने दहलीज को जब छुआ।

नित नई चाह में , रंग भरता रहा।

 

नैन भी नेह का पाठ पढ़ने लगे।

नींद में प्यार के ख़्वाब गढ़ने लगे।

खुशबुओं की चाहत पे मरता रहा।

“जिंदगी का सफ़र”,यों गुजरता रहा।

 

अरमान रिवायतों में ढलने लगें।

पा हुनर हम कमाने निकलने लगे।

फिर दायित्वों की किश्त भरता रहा।

“जिंदगी का सफ़र”,यों गुजरता रहा।

 

इक शाम राह में , हादसा घट गया।

जिगर था मेेरा अकस्मात फट गया।

रोज जीता रहा ,रोज मरता रहा।

“जिंदगी का सफ़र”,यों गुजरता रहा।

 

#सर्वाधिकार सुरक्षित मौलिक

#बी.एल.गोठवाल,कोटा-राज.

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