रुदाली से ‘रेंट-ए-फ्रेंड’ तक : जब साथ भी किराए पर मिलने लगा– परमानन्द गोयल
कोटा/कभी राजस्थान के गाँवों में रोने के लिए पैसे मिलते थे, आज घूमने, बतियाने और साथ ताश या कैरम खेलने के लिए पैसे मिलते हैं। समय बदल गया है, लेकिन दोनों के पीछे छिपी सच्चाई एक ही है—अकेलापन और भावनाओं का बाज़ार।
राजस्थान के पश्चिमी इलाकों—जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर और सीमावर्ती गाँवों में लंबे समय तक रुदाली प्रथा प्रचलित रही। किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की मृत्यु पर विलाप के लिए रुदालियों को बुलाया जाता था। काले वस्त्रों में वे करुण रुदन करती थीं और कई दिनों तक शोक का वातावरण बनाए रखती थीं। मनोवैज्ञानिक तर्क यह भी था कि उनका करुण रुदन सदमे में जड़े लोगों के आँसू बाहर निकाल देता था, जिससे मन का बोझ हल्का हो जाता था। समय के साथ यह परंपरा लगभग समाप्त हो गई।
आज समाज एक नए दौर में है। जापान में ‘रेंट-ए-फ्रेंड’ वर्षों से प्रचलित है, अमेरिका और अनेक महानगरों में ‘कम्पेनियन सर्विस’ सामान्य बात है और अब इसकी आहट भारत में भी सुनाई देने लगी है। अकेले बुजुर्गों या व्यस्त लोगों के लिए साथ घूमने, बातचीत करने, पार्क में टहलने या ताश-कैरम खेलने तक के लिए साथी उपलब्ध हैं।
यहीं राजकुमार हिरानी निर्देशित चर्चित फिल्म ‘मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.’ का एक मार्मिक दृश्य याद आता है। एक बुजुर्ग, जिनके डॉक्टर बेटे के पास उनके साथ कैरम खेलने तक का समय नहीं है, अकेलेपन से घुट रहे हैं। मुन्ना भाई उनके पास बैठकर कैरम खेलता है और कुछ ही देर में उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आती है। यह दृश्य बताता है कि कई बार सबसे असरदार दवा कोई गोली नहीं, बल्कि किसी अपने का साथ होता है।
इसी संदर्भ में एक वास्तविक प्रसंग भी उल्लेखनीय है। बूंदी जिले के एक व्यक्ति का वर्षों पहले मुंबई में एक उच्च पद पर चयन हुआ। वहाँ बड़ा बंगला और सभी सुविधाएँ थीं, लेकिन उनके गाँव में अकेले रह रहे पिता की चिंता उन्हें हमेशा रहती थी। उन्होंने गाँव के कुछ परिचित लोगों को वेतन पर केवल इसलिए अपने पास रखा कि वे उनके पिता के साथ समय बिताएँ, ताश खेलें और उनका मन बहलाएँ। यह घटना बताती है कि इंसान को केवल सुविधाएँ नहीं, बल्कि अपनापन, संवाद और साथ भी चाहिए।
निस्संदेह, कम्पेनियन सेवाएँ अनेक लोगों के लिए रोजगार और कई अकेले बुजुर्गों के लिए सहारा बन सकती हैं। फिर भी प्रश्न यही है कि क्या खरीदा हुआ साथ कभी रिश्तों की आत्मीयता की बराबरी कर सकता है? मुन्ना भाई ने जो साथ निस्वार्थ दिया, वही साथ आज बाज़ार में बिक रहा है।
यदि हम अपने घर के बुजुर्गों, पड़ोस के अकेले लोगों या मित्रों के साथ प्रतिदिन केवल दस-पंद्रह मिनट भी बिना मोबाइल के बैठ जाएँ, उनकी बातें सुन लें, उनके साथ चाय पी लें या ताश-कैरम खेल लें, तो शायद साथ खरीदने की नौबत ही न आए।
कभी आँसू किराए पर मिलते थे, आज साथ किराए पर मिल रहा है। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को पहले से अधिक सुविधाजनक अवश्य बना दिया है, लेकिन संवेदनाएँ आज भी केवल रिश्तों की गर्माहट में ही जीवित रहती हैं। यदि हम अपने परिवार और समाज में थोड़ा समय, थोड़ा अपनापन और थोड़ा संवाद लौटा दें, तो शायद किसी को दोस्त, हमदर्द या साथ किराए पर लेने की आवश्यकता ही न पड़े। आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती सुविधाओं का अभाव नहीं, बल्कि आत्मीय रिश्तों का क्षय है। इसलिए समय रहते हमें यह समझना होगा कि सच्चा साथ खरीदा नहीं जाता, उसे प्रेम, विश्वास और अपनत्व से निभाया जाता है। यही इस बदलते दौर की सबसे बड़ी सीख है।






