कोटा। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी अरविन्द सिसोदिया ने अयोध्या के राममंदिर चंदा चोरी प्रकरण में ” उत्तरप्रदेश सरकार एवं श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास द्वारा की जा रही कार्रवाई को पूरी तरह न्यायोचित, कानूनसम्मत और पारदर्शी बताते हुए कहा कि विपक्ष का पूरा अभियान अब ” निर्दोषों को फंसाओ अभियान ” की राजनीति का पर्याय बन गया है।” उन्होंने कहा कि ” मंदिर न्यास की व्यवस्था पूरी तरह स्वतंत्र रहीं है, इसके लिए न तो कोई अन्य पार्टी, अन्य संस्था और राज्य या केंद्र सरकार जिम्मेदार हैँ, न ही उन्हें निरपराध होते हुये आरोपी बनाया जा सकता। किन्तु राजनैतिक फायदे के लिए मूल अपराधियों को छोड़ कर, उन उच्च आदर्शो पर छिंटा कसी हो रही है, जिनका इस घटना से कोई लेना देना ही नहीं है। इस घटनाक्रम में विपक्ष राजनैतिक द्वेषता से महा झूठ भी फैला रहा है। ”
उन्होंने कहा कि “सामान्य न्याय व्यवस्था का सिद्धांत है कि कार्रवाई चोरी करने वाले के विरुद्ध होती है, रिपोर्ट दर्ज कराने वाले के विरुद्ध नहीं। लेकिन इस मामले में विपक्ष वास्तविक आरोपितों पर मौन साधे हुए है और उनका पूरा निशाना उन लोगों पर है, जिन्होंने चोरी उजागर करने और कार्रवाई कराने की पहल की। यह आचरण स्वाभाविक नहीं, बल्कि गंभीर राजनीतिक षड्यंत्र की बू देता है।”
सिसोदिया ने कहा कि “जो राजनीतिक दल दशकों तक मुस्लिम वोट प्राप्ती के लिए तुष्टिकरण की राजनीती करते रहे हैँ, भगवान श्रीराम, रामजन्मभूमि आंदोलन और हिंदुत्व का विरोध करते रहे, वे आज अचानक रामभक्ति का मुखौटा पहनकर मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं। यह आस्था नहीं, बल्कि अवसरवादी राजनीति का प्रदर्शन है। जनता अच्छी तरह समझ रही है कि उनका उद्देश्य सत्य की खोज नहीं, बल्कि राम मंदिर की प्रतिष्ठा और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था को कटघरे में खड़ा करना है।”
उन्होंने कहा कि “वास्तविक दोषियों के विरुद्ध एक शब्द न बोलना और निर्दोष लोगों को जबरन विवाद में घसीटने का सुनियोजित प्रयास यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर विपक्ष किन लोगों को बचाना चाहता है और किसके इशारे पर यह पूरा दुष्प्रचार अभियान चलाया जा रहा है?”
सिसोदिया ने कहा कि “इस मामले में सबसे अधिक शोर मचाने वाले अनेक राजनीतिक दलों और उनके नेताओं का अपना रिकॉर्ड जनता के सामने है। जिन पर भ्रष्टाचार, आर्थिक अनियमितताओं और आय से अधिक संपत्ति जैसे मामलों में जांच या न्यायिक प्रक्रियाएं चल चुकी हैं, वे आज नैतिकता का प्रमाणपत्र बांटने का प्रयास कर रहे हैं। जनता इस दोहरे चरित्र और राजनीतिक पाखंड को भली-भांति पहचानती है।”
उन्होंने कहा कि “किसी भी आपराधिक मामले में जांच एजेंसियों को साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष जांच करने देना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना है। लेकिन जांच पूरी होने से पहले जिस प्रकार राजनीतिक बयानबाजी, मीडिया ट्रायल और दुष्प्रचार का तूफान खड़ा किया जा रहा है, उससे स्पष्ट है कि कुछ लोगों का उद्देश्य न्याय नहीं, बल्कि जनभावनाओं को भड़काना और जांच प्रक्रिया को प्रभावित करना है।”
सिसोदिया ने आरोप लगाया कि “राम मंदिर केवल एक भवन नहीं, बल्कि करोड़ों देशवासियों की आस्था और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। इस प्रकरण की आड़ में मंदिर की गरिमा और उसकी विश्वसनीयता पर प्रहार करने का प्रयास किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता।”
उन्होंने कहा कि “यदि किसी व्यक्ति ने अपराध किया है तो उसे कानून के अनुसार कठोरतम दंड मिलना चाहिए, लेकिन किसी निर्दोष को केवल राजनीतिक लाभ के लिए आरोपित करना या किसी दोषी को बचाने का वातावरण बनाना—दोनों ही न्याय व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध हैं।”
सिसोदिया ने विश्वास व्यक्त किया कि “निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के बाद पूरा सत्य देश के सामने आएगा तथा वास्तविक दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिलेगा।” उन्होंने विपक्ष से आग्रह किया कि वह राम मंदिर जैसे राष्ट्र की आस्था के विषय को राजनीतिक हथियार बनाने के बजाय जांच प्रक्रिया का सम्मान करे, सबूत है तो जाँच एजेंसी को देंऔर जनता को भ्रमित करने का प्रयास न करे।






