Friday, June 19, 2026
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​अरावली का विनाश रुका नहीं तो रेगिस्तान में बदल जाएगा उत्तर भारत: पर्यावरणविद्

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित नई समिति से अरावली के सभी 64 जिलों को शामिल करने और निष्पक्ष जांच की मांग उठी

​नई दिल्ली/जयपुर: करीब 2 अरब वर्ष पुरानी और 700 किलोमीटर में फैली अरावली पर्वतमाला आज अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर संकट से जूझ रही है। ‘अरावली विरासत जन अभियान’ से जुड़े देश भर के पर्यावरणविदों, वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि अरावली का विनाश नहीं रुका, तो थार मरुस्थल का फैलाव बढ़ने से पूरा उत्तर भारत रेगिस्तान में तब्दील हो जाएगा।

​पर्यावरणविदों ने अरावली के संरक्षण और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 25 मई 2026 को गठित नई समीक्षा समिति को लेकर निम्नलिखित मुख्य मांगें उठाई हैं:

​विवादित परिभाषा और निष्पक्षता: पर्यावरण मंत्रालय (MoEF&CC) के अधीन रहकर निष्पक्ष समीक्षा संभव नहीं है। मांग है कि समिति के अध्यक्ष और सदस्य सचिव मंत्रालय से बाहर के स्वतंत्र पारिस्थितिकी विशेषज्ञ या वैज्ञानिक हों और रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को सौंपी जाए।

​सभी 64 जिलों को मिले शामिल: फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) की सितंबर 2025 की रिपोर्ट को दबाने और अरावली जिलों की संख्या 63 से घटाकर सिर्फ 37 करने वाले अधिकारियों की जांच हो। नई समिति अपनी स्टडी में मथुरा (गोवर्धन पर्वत) सहित सभी 64 जिलों को शामिल करे।

​जमीनी दौरा और समयसीमा: समिति सिर्फ ईमेल तक सीमित न रहे, बल्कि हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के खनन प्रभावित गांवों का दौरा कर स्थानीय लोगों से संवाद करे। रिपोर्ट के लिए 31 अगस्त 2026 की समयसीमा बढ़ाई जाए।

​समग्र प्रभाव का अध्ययन: पिछले 50 वर्षों में हुए खनन, रियल एस्टेट और कचरा निस्तारण के सामाजिक, स्वास्थ्य और जल-स्तर पर पड़े प्रभावों का राष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से एक स्वतंत्र व समग्र अध्ययन कराया जाए।

​’प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ लागू हो: अवैध खनन और अत्यधिक जल खपत करने वाली गतिविधियों को तुरंत बंद कर ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ के तहत दोषी कंपनियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए।  प्रमुख वक्तव्य:

​”पिछले कुछ दशकों में अरावली में 12 से अधिक बड़े अवरोध (ब्रीच) बन चुके हैं, जिससे थार मरुस्थल की धूल अब दिल्ली-एनसीआर और उत्तर प्रदेश तक पहुँच रही है।”

— नीलम अहलूवालिया, सह-संस्थापक, अरावली विरासत जन अभियान

“पूरी अरावली पर्वतमाला पर पिछले 50 वर्षों में हुई गतिविधियों के सामाजिक, स्वास्थ्य और पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र और समग्र अध्ययन कराया जाना चाहिए। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले गोवा, कर्नाटक और ओडिशा के संवेदनशील खनन मामलों में किया था।”

— प्रशांत पाटनी, संरक्षक, शाहबाद जंगल बचाओ संघर्ष समिति

​अंतिम मांग:

नागरिकों ने मांग की है कि अरावली की कमजोर कानूनी परिभाषाओं को समाप्त कर इसके शेष बचे पूरे 700 किलोमीटर क्षेत्र को ‘अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र’ घोषित किया जाए, ताकि करोड़ों लोगों की जल, जलवायु और वन्यजीव सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

 

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