लेखक: परमानन्द गोयल
कोटा/माँ की ममता जितनी मुखर और स्पष्ट होती है, पिता का स्नेह अक्सर उतना ही मौन, गहरा और अदृश्य होता है। पिता परिवार की नींव बनकर उसे स्थिरता प्रदान करता है। पिता, एक बरगद के वृक्ष के समान होते हैं, जो स्वयं चिलचिलाती धूप सहकर अपने परिवार को शीतल छाँव प्रदान करते हैं। उनका अस्तित्व घर की उस मजबूत नींव की तरह है, जो स्वयं तो कभी दिखाई नहीं देती, पर जिस पर समूचे भवन का गौरव टिका होता है।
पिता का त्याग सागर-सा गहरा, परंतु झील-सा शांत होता है। उनकी भाषा शब्दों में नहीं, बल्कि उनकी आँखों की गहराई, माथे की बढ़ती हुई सिलवटों और दिन-भर की थकान से झुके हुए कंधों में छिपी होती है। एक पिता का साधारण-सा कहना— “मैं ठीक हूँ”—अक्सर वर्षों की अधूरी नींद, अनकहे मानसिक तनाव और अपनी दफन होती इच्छाओं का एक मूक आवरण होता है। यह मौन केवल उनकी उपस्थिति का प्रतीक नहीं, बल्कि उनके भीतर चल रहे अथाह संघर्षों का प्रमाण है, जो उद्घोष करता है कि पिता ही जीवन का असली संबल और शक्ति है।
पिता का त्याग उनकी पुरानी कलाई घड़ी, घिसे हुए तलवों वाले जूते या बरसों पुरानी शर्ट्स जैसी वस्तुओं में भी झलकता है, जहाँ वे अपनी जरूरतों को परिवार की इच्छाओं के पीछे रखते हैं। यह संवेदनात्मक त्याग आज भी उतना ही जीवंत और अदृश्य है। इस योगदान का बोध अक्सर तब होता है जब हमारे स्वयं के पिता बनने के बाद हमारे बच्चे युवा होने की ओर अग्रसर होते हैं। तब वह आत्मग्लानि मन को सालती है कि काश! यह मौन संवाद हमने पहले पढ़ लिया होता।
जैसा कि किसी ने कहा है:
“मुझे रख दिया शीतल छाँव में, खुद जलते रहे धूप में, मैंने देखा है एक फरिश्ता, पिता के रूप में।” यह पंक्ति पिता के निस्वार्थ प्रेम और आत्म-आहुति को दर्शाती है। पिता पत्थर नहीं होते; वे परिवार के लिए ‘चट्टान’ होने का अभिनय करते हैं। बेटी की विदाई हो या बेटे की पहली बड़ी सफलता, उनकी भीगी हुई पलकें एकांत में गवाही देती हैं कि उनके सख्त चेहरे के पीछे एक अत्यंत कोमल हृदय धड़कता है, जिसे वे दुनिया की नजरों से बचाकर रखते हैं।
पिता के शब्दकोश में “मैं” शब्द का कोई स्थान नहीं होता। उनकी सुबह दूसरों की खुशियों से शुरू होती है और रात अपनों की चिंता के साथ समाप्त। उनकी व्यक्तिगत इच्छाएँ किसी डायरी के अंतिम पन्ने पर लिखे उन अधूरे नोट्स जैसी होती हैं, जिन्हें शायद कभी पूरा होने का अवसर न मिले। फिर भी वे संतुष्ट रहते हैं, क्योंकि उनकी सार्थकता परिवार की मुस्कान में निहित है। वे अपने सपनों की चाह में बच्चों की सफलताओं का महल खड़ा करते हैं।
निष्कर्षतः, पिता का प्रेम अल्पभाषी होता है, पर वह कभी अनुपस्थित नहीं होता। यह छत की दरार से टपकते पानी को रोकते समय, स्कूल की फीस के लिए जमा की गई पाई-पाई में, और देर रात घर के मुख्य द्वार पर परिवार की राह तकती आँखों में महसूस होता है। पिता का मौन त्याग कोई उपदेश नहीं देता, बल्कि एक ऐसी अनकही गहराई है जिसे केवल प्रेम और संवेदना की भाषा में ही पढ़ा जा सकता है। पिता वह खामोश साया है, जिसके होते धूप का अहसास तक नहीं होता।





