Sunday, April 26, 2026
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पिछले 50 वर्षों में जनसंख्या बढ़ती रही, लेकिन कांग्रेस के कारण सीटें नहीं बढ़ीं – अरविन्द सिसोदिया 

कोटा। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि “पिछले 50 वर्षों से वास्तविक परिसीमन रोककर लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों को जनसंख्या के अनुपात में वृद्धि को रोक रखा है। सीटों की संख्या नहीं बढ़ाना देश की जनता के साथ सीधा अन्याय है। यह लोकतंत्र, संविधान और जनप्रतिनिधित्व, तीनों के खिलाफ सुनियोजित अवरोध है, जिसे देश कभी माफ नहीं करेगा।”

उन्होंने कहा कि “यह देश देशवासियों का है, कोई भी पार्टी इस पर अपनी मनमर्जी नहीं थोप सकती। देश की जनता सांसदों और विधायकों को संविधान के तहत जवाबदेही निभाने के लिए चुनती है, किसी राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा बनने या गैरज़रूरी बाधाऐं ख़डी करने के लिए नहीं। लेकिन कांग्रेस ने दशकों से लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों को बढ़ने से रोककर तथा स्थिर रखकर जनता के वास्तविक प्रतिनिधित्व से सदनों को बंचित रखा है।”

अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि “प्रत्येक जनगणना के बाद जनसंख्या के अनुपात में सीटों का पुनर्निर्धारण और विस्तार संविधान की मूल भावना और मूल व्यवस्था है। 1951-52 से 1971 तक यही व्यवस्था लागू रही और लोकसभा सीटें 499 से बढ़ते-बढ़ते 543 तक पहुँचीं। लेकिन आपातकाल के दौर में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इस प्रक्रिया को अगले 25 वर्षों के लिए रोक दिया गया, जो बाद में स्थायी जड़ता में बदल गई। पिछले 50 वर्षों में जनसंख्या बढ़ती रही, लेकिन सीटें नहीं बढ़ीं।”

सिसोदिया ने कहा कि “प्रथम आम चुनाव 1951-52 में एक लोकसभा सांसद पर औसत मतदाता लगभग साढ़े तीन लाख थे। छठे आम चुनाव 1977 में यह संख्या 6 लाख तक पहुँच गई, जबकि अठारहवें आम चुनाव 2024 में एक सांसद पर औसत मतदाता लगभग 18 लाख हो गए। इसलिए सीटें बढ़ाना जनहित में अत्यंत आवश्यक है। यही स्थिति विधानसभाओं के विधायकों के मतदाता औसत की भी है।”

उन्होंने कहा कि “आज स्थिति यह है कि देश की जनसंख्या 50 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है, लेकिन लोकसभा सीटें अब भी 543 पर ही अटकी हुई हैं। यही हाल विधानसभाओं का भी है। परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में एक सांसद पर 25 लाख से अधिक मतदाताओं का बोझ है और लगभग 130 से अधिक सीटों पर मतदाता संख्या 20 लाख से ऊपर पहुँच चुकी है। यह असमानता लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर रही है और समता के सिद्धांत का मज़ाक बना रही है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि “कांग्रेस की हल्की राजनीति के कारण यह स्थिति ‘एक व्यक्ति, एक वोट, समान मूल्य’ के सिद्धांत के साथ खुला अन्याय हो रहा है। यह केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि देश के युवाओं, महिलाओं और सभी वर्गों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधा प्रहार है। सीटें नहीं बढ़ने से नई पीढ़ी के लिए संसद और विधानसभाओं के दरवाज़े सीमित हो गए हैं।”

उन्होंने कहा कि “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा और विधानसभाओं में सीटें बढ़ाने तथा महिला आरक्षण लागू करने की पहल संविधान सम्मत और लोकतांत्रिक कर्तव्य की पूर्ति है। इसका स्वागत होना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस और विपक्ष का गैरज़रूरी विरोध लोकतंत्र के हितों के खिलाफ है।”

अंत में उन्होंने कहा कि “अब समय आ गया है कि इस 50 साल पुराने ठहराव को तोड़ा जाए। लोकसभा और विधानसभाओं में सीटें भी बढ़ें और महिला आरक्षण भी लागू हो। देश के हर नागरिक की आवाज़ समान है और उसे समान प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिए।”

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