✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी ,युवा मैनेजमेंट विश्लेषक ,पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट
नई दिल्ली में हुए ग्लोबल बिजनेस समिट के मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि उन्होंने वैश्विक संकटों को भय की भाषा में नहीं, रणनीतिक अवसर के रूप में परिभाषित किया। महामारी, युद्ध और सप्लाई चेन के टूटने जैसी घटनाओं को उन्होंने ‘अपरिहार्य जोखिम’ नहीं, बल्कि नीति सुधार और संस्थागत मजबूती की कसौटी बताया। यह दृष्टि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत का अनुभव दिखाता है कि बीते एक दशक में किए गए सुधार किसी आपात दबाव में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विश्वास के साथ लागू किए गए हैं।

नई दिल्ली में हुए ग्लोबल बिजनेस समिट के मंच से जब देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बोलना शुरू किया, तो यह भाषण केवल अर्थव्यवस्था के आंकड़ों या नीतिगत घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा अपितु उसमें बीते एक दशक की वैश्विक उथल पुथल, भारत के भीतर हुए सुधारों और आने वाले सौ वर्षों की तैयारी का एक व्यापक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई दिया,जो भारत के प्रति दूरदर्शिता और विकास के असल स्वप्न को दर्शाता है जिसे एक सो चालीस करोड़ जनसंख्या महसूस कर रही है। मोदी ने महामारी, युद्ध, सप्लाई चेन में बिखराव और वैश्विक तनावों से भरे इस दशक को उन्होंने “डिसरप्शन का दशक” कहा, लेकिन साथ ही यह भी रेखांकित किया कि यही दौर भारत के लिए अभूतपूर्व विकास, आत्मविश्वास एवं देदीप्यमान उतरोतर रिकॉर्ड प्रगति का काल बना। प्रधानमंत्री का तर्क सीधा था,संकट ही किसी देश की असली क्षमता को उजागर करता है जिससे ही हमारा हौसला और बुलंद होता है। हालांकि पिछले दशक तक तब भारत दुनिया की ग्यारहवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था। आशंका यह थी कि इतनी वैश्विक उथल पुथल में भारत और पीछे चला जाएगा। लेकिन आज स्थिति यह है कि भारत तेजी से दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है। वैश्विक विकास में भारत का योगदान सोलह प्रतिशत से अधिक है और यह आने वाले वर्षों में और बढ़ने वाला है। उनका दावा किसी भविष्यवाणी की तरह नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे आकलन की तरह सामने आया कि इस सदी के बदलावों का बड़ा आधार भारत बनेगा।

उन्होंने यह भी याद दिलाया कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था अब अपनी प्रासंगिकता खो रही है। एक समय माना गया था कि एक ही मॉडल पूरी दुनिया पर लागू किया जा सकता है, कि सप्लाई चेन हमेशा स्थिर रहेंगी और देश केवल योगदानकर्ता की भूमिका निभाएंगे। लेकिन आज हर देश को यह समझ आ रहा है कि अपनी मजबूती और लचीलापन खुद तैयार करना होगा। भारत ने इस सच्चाई को बहुत पहले स्वीकार कर लिया था।2015 में नीति आयोग के गठन के साथ ही भारत ने यह तय कर लिया था कि वह किसी एक विदेशी विकास मॉडल की नकल नहीं करेगा। देश अपने अनुभव, जरूरतों और हितों के अनुसार फैसले लेगा। यही आत्मविश्वास भारत को डिसरप्शन के दशक में भी मजबूत बनाए रखने में सहायक रहा। प्रधानमंत्री ने इसे सुधार की “रिफॉर्म एक्सप्रेस” कहा, जो मजबूरी में नहीं बल्कि विश्वास के साथ आगे बढ़ रही है।उनका कहना था कि पहले सुधार तब होते थे, जब हालात हाथ से निकलने लगते थे। 1991 के आर्थिक सुधार हों या बाद के अन्य कदम, अधिकतर फैसले संकट के दबाव में लिए गए। इसके विपरीत, बीते ग्यारह वर्षों में सुधार नीति, प्रक्रिया, डिलीवरी और सोच सभी स्तरों पर किए गए हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पहले कैबिनेट नोट तैयार होने में महीनों लग जाते थे, जबकि अब निर्णय प्रक्रिया समयबद्ध और तकनीक आधारित है। रेलवे ओवरब्रिज, सड़क और सीमा क्षेत्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर में आई तेजी इसी बदली हुई कार्य संस्कृति का परिणाम है।डिजिटल भुगतान प्रणाली यूपीआई को उन्होंने इस बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण बताया। यह केवल एक ऐप नहीं, बल्कि नीति, प्रक्रिया और डिलीवरी के तालमेल का नतीजा है। जिन लोगों को कभी बैंकिंग सुविधाओं की उम्मीद नहीं थी, वे आज डिजिटल लेनदेन का हिस्सा हैं। जनधन, आधार और मोबाइल की त्रयी ने आर्थिक समावेशन को नई गति दी है।प्रधानमंत्री ने बजट की सोच में आए बदलाव पर भी बात की। पहले बजट का मतलब केवल यह होता था कि कितना पैसा आवंटित हुआ। अब ध्यान इस पर है कि उस खर्च से क्या परिणाम निकले। इंफ्रास्ट्रक्चर पर बढ़ता निवेश, विश्वविद्यालय टाउनशिप, नए रेल कॉरिडोर और शहरों के आर्थिक क्षेत्र भविष्य की तैयारी के रूप में देखे जा रहे हैं। टेक्नोलॉजी और नवाचार को विकास का केंद्र मानते हुए स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा दिया गया है। आज देश में दो लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप हैं, जो विविध क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।राज्यों को सशक्त करने की दिशा में भी बड़ा बदलाव हुआ है। 2004 से 2014 के बीच जहां राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के रूप में लगभग 18 लाख करोड़ रुपये मिले थे, वहीं 2014 से 2025 के बीच यह राशि 84 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो चुकी है। इससे राज्यों को अपने स्तर पर विकास योजनाएं आगे बढ़ाने की क्षमता मिली है। फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स पर चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने एक दिलचस्प सवाल उठाया। अगर देश वही था, युवा शक्ति वही थी, तो 2014 से पहले इतने समझौते क्यों नहीं हो पाए। उनका जवाब था कि बदलाव नीति और नीयत में आया है। जब देश आत्मविश्वास से भरा होता है और उसका मैन्युफैक्चरिंग बेस मजबूत होता है, तभी दुनिया उस पर भरोसा करती है। मोदी के भाषण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संवेदनशीलता से जुड़ा था जिसमें दिव्यांगजनों के लिए भारतीय सांकेतिक भाषा को एकरूप बनाना हो या ट्रांसजेंडर समुदाय को कानूनी पहचान देना, ये फैसले सरकार की सोच में आए बदलाव को दर्शाते हैं। मुफ्त अनाज योजना को लेकर उठने वाले सवालों पर उन्होंने कहा कि गरीबी से बाहर निकले लोगों को फिर से उसी चक्र में फंसने से बचाना भी सरकार की जिम्मेदारी है। 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह केवल आज की पीढ़ी के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए बोया गया बीज है। अगर स्वतंत्रता सेनानियों ने भविष्य की चिंता छोड़ दी होती, तो देश आजाद नहीं होता। उसी तरह आज का परिश्रम कल की नींव है।आखिर में उन्होंने कहा कि दुनिया को आने वाले समय में और भी बड़े डिसरप्शन के लिए तैयार रहना होगा।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इस बदलाव को और तेज करेगा। भारत इस चुनौती के लिए भी तैयार है और आने वाला ग्लोबल एआई इम्पैक्ट समिट इसका साफ संकेत देता है। यह भाषण केवल अपनी उपलब्धियाँ गिनाने के लिए नहीं था, बल्कि यह समझाने की कोशिश थी कि भारत सुधारों, संवेदनशील सोच और दूरगामी दृष्टि के सहारे खुद को नई वैश्विक व्यवस्था में एक मजबूत और भरोसेमंद स्थान पर स्थापित कर रहा है।






