Saturday, October 17, 2026
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स्वामी गोविन्द देव गिरी जी ने शाहबाद हाइड्रो पावर परियोजना पर जताई गहरी चिंता, बोले—प्रकृति विनाश वाला विकास भावी पीढ़ियों से खिलवाड़

-जितेंद्र कुमार शर्मा

बारां। श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के अवसर पर बारां पधारे राष्ट्रीय संत एवं श्रीराम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट, अयोध्या के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविन्द देव गिरी जी महाराज ने बारां जिले की शाहबाद तहसील में प्रस्तावित ग्रीनको एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड, हैदराबाद की हाइड्रो पावर बिजली परियोजना को लेकर गहरा दुख एवं चिंता व्यक्त की है।

शाहबाद घाटी संरक्षण संघर्ष समिति, बारां के संरक्षक प्रशांत पाटनी ने बताया कि कथा संपन्न होने के बाद बारां से प्रस्थान से पूर्व वरिष्ठ पत्रकार दिलीप शाह मधुप द्वारा लिए गए साक्षात्कार में स्वामी जी ने इस परियोजना को लेकर अपनी स्पष्ट और चिंताजनक राय रखी।

स्वामी गोविन्द देव गिरी जी महाराज ने कहा कि “यह अत्यंत पीड़ादायक है कि एक ओर शासन-प्रशासन वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति संतुलन की बातें करता है, वहीं दूसरी ओर ऐसी परियोजनाओं को स्वीकृति दी जाती है, जिनसे घने जंगलों, प्राकृतिक जल स्रोतों, वन्य जीवों और स्थानीय जनजीवन पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।” उन्होंने इसे नीति और व्यवहार के बीच का स्पष्ट विरोधाभास बताया और कहा कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही भारतीय जीवन दर्शन का मूल आधार है।

महाराज श्री ने विकास की अवधारणा पर भी गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि “विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति को नष्ट कर दे, वह भावी पीढ़ियों के भविष्य से खिलवाड़ के समान है। जंगलों का विनाश और पारिस्थितिकी असंतुलन का दुष्परिणाम आने वाले वर्षों में समाज को गंभीर रूप से भुगतना पड़ेगा।” उन्होंने पेड़, पर्वत, नदियों और वनों को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवनदायिनी शक्तियां बताते हुए इनके संरक्षण को नैतिक और राष्ट्रीय दायित्व बताया।

शाहबाद क्षेत्र की प्राकृतिक समृद्धि का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने कहा कि यहां के जंगल और जैव विविधता केवल स्थानीय महत्व की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय धरोहर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि “बिना व्यापक जनसहमति, पर्यावरणीय प्रभावों के गंभीर अध्ययन और पूर्ण पारदर्शिता के किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाना उचित नहीं है।”

अंत में स्वामी गोविन्द देव गिरी जी महाराज ने शासन-प्रशासन से अपील की कि पर्यावरण संरक्षण को केवल औपचारिक नारा न बनाकर व्यवहार में उतारा जाए। साथ ही उन्होंने समाज से भी जागरूक होकर जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि “सच्चा राष्ट्र निर्माण तभी संभव है, जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।”

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