सम्मान : योग्यता का प्रोत्साहन या अहंकार का बीजारोपण? -परमानन्द गोयल
किसी भी समाज या संस्था में जब किसी व्यक्ति को उसके अच्छे कार्यों के लिए सम्मानित किया जाता है, तो यह केवल मंच पर स्मृति-चिह्न देने की औपचारिकता नहीं होती। ऐसा सम्मान व्यक्ति के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और उसे आगे और बेहतर करने की प्रेरणा देता है। सही व्यक्ति को मिला सम्मान समाज में सकारात्मक सोच और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है।
जब किसी योग्य व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाता है, तो वह दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनता है। लोग यह समझते हैं कि मेहनत और ईमानदारी से किया गया कार्य पहचाना जाता है। इससे छिपी हुई प्रतिभाएँ सामने आती हैं और समाज आगे बढ़ता है।
लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सम्मान योग्यता के बजाय अन्य आधारों पर दिया जाता है। ऐसी स्थिति में भी व्यक्ति के पास संभलने का अवसर होता है। कम से कम आगे तो उसे ऐसे कार्य करने चाहिए, जिनकी उत्कृष्टता के आधार पर भविष्य में स्वतः पहचान बने और बिना किसी पहल के सम्मान के लिए आमंत्रण प्राप्त हो। कई बार देखा गया है कि व्यक्ति सम्मानित तो हो जाता है, पर न उसने पहले अच्छे कार्य किए होते हैं और न ही आगे करने का इरादा रहता है। ऐसी प्रवृत्ति स्वयं उसके लिए भी घातक सिद्ध होती है, क्योंकि बिना मेहनत के मिला सम्मान व्यक्ति में गलतफहमी और अहंकार पैदा करता है। उसे लगने लगता है कि वह सब कुछ जानता है, जबकि वास्तव में उसे सीखने की आवश्यकता होती है। परिणामस्वरूप उसका विकास रुक जाता है।
ऐसे सम्मानों से उन लोगों का मनोबल भी टूटता है, जो ईमानदारी से परिश्रम करते हैं। धीरे-धीरे समाज ऐसे सम्मानों पर विश्वास करना छोड़ देता है और सम्मान देने वाली संस्थाओं की साख भी प्रभावित होती है।
अतः आवश्यक है कि सम्मान देने वाली संस्थाएँ पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ योग्य व्यक्तियों का चयन करें। सम्मान वही सार्थक है, जो मेहनत और योग्यता से अर्जित किया गया हो।
सम्मान व्यक्ति को ऊँचा उठाने का साधन बने, अहंकार पैदा करने का कारण नहीं।






