Saturday, April 18, 2026
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संसद में ‘बिरला’ का भाषाई यज्ञ: प्रधानमंत्री ने भी माना, कोटा के लाल ने बढ़ाया भारत का मान

प्रधानमंत्री की सराहना और बिरला का विजन; कैसे राजस्थान के लाल ने भारतीय संसद को बनाया देश की सांस्कृतिक विविधता का असली मंच

✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी ,युवा मैनेजमेंट विश्लेषक एवं पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट ,कोटा

“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के प्रयासों की सराहना ने कोटा और राजस्थान को राष्ट्रीय पटल पर नई पहचान दी है। बिरला ने संसद में केवल कानून ही नहीं बनाए, बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं को अनुवाद के माध्यम से मुख्यधारा से जोड़कर भाषाई लोकतंत्र’ की स्थापना की है। कोटा से निकलकर दिल्ली की कमान संभालने वाले बिरला का यह कार्यकाल विधायी दक्षता और सांस्कृतिक जुड़ाव का अनूठा उदाहरण बन गया है, जो नए भारत की समावेशी तस्वीर पेश करता है”

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना का दर्पण होती है। हाल के संसदीय सत्रों में जो एक सुखद और दूरगामी बदलाव दिखाई दिया है, वह है ,सदन के पटल पर गूंजती भारत की विभिन्न बोलियां और भाषाएं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के नेतृत्व में संसद अब केवल हिंदी और अंग्रेजी तक सीमित न रहकर, संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाओं की जीवंत संवाहिका बन रही है। इस भाषाई क्रांति की सराहना स्वयं प्रधानमंत्री ने की है, जो न केवल अध्यक्ष के विजन की पुष्टि है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का संकेत भी है।ओम बिरला ने अपने कार्यकाल में यह सुनिश्चित किया कि भाषा किसी भी जन-प्रतिनिधि के लिए बाधा न बने। तकनीकी सुविधाओं और रीयल-टाइम अनुवाद की व्यवस्था को सुदृढ़ कर उन्होंने सदन के भीतर एक ऐसा वातावरण तैयार किया है, जहां एक सांसद अपनी मातृभाषा में अपनी बात गर्व के साथ रख सकता है। जब एक सांसद तमिल, बांग्ला, मराठी या राजस्थानी पुट वाली हिंदी में अपनी बात कहता है, तो वह केवल एक विचार नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र की संस्कृति और अस्मिता को दिल्ली के इस सर्वोच्च सदन से जोड़ता है।कोटा वासियों के लिए यह गौरव का विषय है कि वहां के प्रतिनिधि ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ी है।

संसदीय कूटनीति और वैश्विक पहचान

ओम बिरला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय संसदीय प्रणाली की गरिमा को नई ऊँचाइयां दी हैं। कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन (CPA) और इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (IPU) जैसे वैश्विक मंचों पर उन्होंने ‘लोकतंत्र की जननी’ के रूप में भारत का पक्ष मजबूती से रखा। हाल ही में बारबाडोस की यात्रा और अन्य द्विपक्षीय वार्ताओं के माध्यम से उन्होंने संसदीय कूटनीति का विस्तार किया, जिससे वैश्विक पटल पर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास और बढ़ा है।

संसदीय उत्पादकता के नए कीर्तिमान

ओम बिरला का कार्यकाल केवल भाषाई सुधारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके नेतृत्व में संसद की कार्यक्षमता (Productivity) में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। 17वीं लोकसभा के दौरान सदन की औसत उत्पादकता लगभग 97% रही, जो पिछले 25 वर्षों में सर्वाधिक है। विशेष रूप से कोरोना काल की चुनौतियों के बावजूद, उन्होंने सत्रों का सुचारू संचालन सुनिश्चित किया और एक समय तो उत्पादकता 167% तक जा पहुँची। यह उनके अनुशासन और समय प्रबंधन का ही परिणाम है कि सदन में शून्यकाल और प्रश्नकाल के दौरान अधिक से अधिक सदस्यों को लोकहित के मुद्दे उठाने का अवसर मिला।

18वीं लोकसभा: उत्पादकता के नए शिखर (111% से 118% तक)

ओम बिरला के दूसरे कार्यकाल में संसद की कार्य-उत्पादकता ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। हाल ही में संपन्न हुए शीतकालीन सत्र (दिसंबर 2025) में लोकसभा की उत्पादकता 111 प्रतिशत रही। इससे पहले, बजट सत्र 2025 के दौरान सदन की उत्पादकता 118 प्रतिशत के प्रभावशाली स्तर तक पहुँच गई थी। बिरला ने यह सुनिश्चित किया कि सदन केवल हंगामे का केंद्र न बने, बल्कि देर रात तक बैठकर लोक-महत्व के विषयों पर चर्चा हो। पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि लोकसभाध्यक्ष

ओम बिरला के उत्कृष्ट नेतृत्व में ही ऐतिहासिक रूप से ‘जीरो ऑवर’ (शून्यकाल) के दौरान रिकॉर्ड संख्या में सदस्यों को अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याओं को पुरजोर रूप से उजागर करने का मौका मिला,जो जमीन हकीकत से सीधे लोकतंत्र के अस्तित्व को सही मायनों में प्रदर्शित करता है।

महत्वपूर्ण विधायी कार्य और ‘विकसित भारत’ का संकल्प

बिरला के वर्तमान कार्यकाल में कई ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाले विधेयक पारित हुए हैं। इनमें “विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (जी राम जी) विधेयक 2025” प्रमुख है, जिसने मनरेगा जैसे पुराने ढांचे में सुधार कर ग्रामीण रोजगार की नई दिशा तय की। इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य सुरक्षा,परमाणु ऊर्जा और बीमा कानूनों में संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा और उनके सफल पारित होने के पीछे बिरला की कुशलता और सभी दलों के बीच समन्वय बिठाने की कला स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रधानमंत्री ने भी उनके इस कौशल की सराहना करते हुए इसे ‘संसदीय दक्षता’ का उत्कृष्ट उदाहरण बताया है।

संसदीय नवाचार: AI और ‘सांसद भाषिणी’

बिरला ने तकनीक को संसदीय प्रक्रिया का अभिन्न अंग बना दिया है। उनके विजन से विकसित ‘डिजिटल संसद’ और ‘सांसद भाषिणी’ (AI आधारित रीयल-टाइम अनुवाद सेवा) ने भाषाई बाधाओं को पूरी तरह खत्म कर दिया है। अब कोई भी सांसद अपनी क्षेत्रीय भाषा में बोलता है, तो तकनीक के माध्यम से उसका अनुवाद तुरंत अन्य भाषाओं में उपलब्ध हो जाता है। यह पहल न केवल उत्पादकता बढ़ाती है, बल्कि सदन के भीतर भारत की ‘एकता और विविधता’ को तकनीकी रूप से सुदृढ़ करती है।वैश्विक मंचों, जैसे राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (CPA) में भी भारत के इस डिजिटल मॉडल की जमकर प्रशंसा हुई है।

अनुशासन और लोकतांत्रिक मर्यादा

ओम बिरला ने सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए अनुशासन को सर्वोपरि रखा है। उनका मानना है कि ‘सदन चर्चा के लिए है, व्यवधान के लिए नहीं’। उन्होंने बार-बार सांसदों से आत्मनिरीक्षण का आग्रह किया ताकि संसदीय समय का सदुपयोग राष्ट्र निर्माण में हो सके। उनके शांत लेकिन सख्त व्यवहार ने सदन में स्वस्थ बहस की परंपरा को पुनर्जीवित किया है, जहाँ विपक्ष की आवाज़ को भी पर्याप्त स्थान मिलता है और सरकारी कार्यों को भी गति प्राप्त होती है

युवा मैनेजमेंट विश्लेषक पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि

बिरला की कार्यशैली ‘सहिष्णुता और अनुशासन’ का संगम है। उन्होंने जटिल विधायी कार्यों को न केवल सुचारू बनाया, बल्कि लंबित विधेयकों को पारित कराने में जो सक्रियता दिखाई, उसने संसदीय कार्यक्षमता के नए मानक स्थापित किए हैं। प्रधानमंत्री द्वारा उनकी सूझबूझ की प्रशंसा करना इस बात का प्रमाण है कि सदन के संरक्षक के रूप में उनका व्यक्तित्व दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सर्वमान्य हुआ है।आज जब कोटा को शिक्षा की काशी के रूप में देखा जाता है, वहीं कोटा के युवाओं के लिए बिरला का यह नेतृत्व एक प्रेरक अध्याय है। यह सिखाता है कि किस प्रकार अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। वास्तव में, लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति की आवाज उसकी अपनी भाषा में सुनी जाए। ओम बिरला के ये प्रयास भारतीय संसद को सही मायनों में ‘जन-संसद’ बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हैं।

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