Wednesday, August 12, 2026
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“ढ़ाईकड़ी लोकछंद में गूंजी लोकसंस्कृति की आवाज़ — ‘सत्यवादी राजा हरिचंद’ पर हृदयस्पर्शी समीक्षा”

-पुस्तक संपादक योगेश यथार्थ

कोटा/ हाड़ौती लोकछंद ‘ढ़ाईकड़ी’ में आपके द्वारा संपादित लोकनाटक की पोथी ‘सतवादी राजा हरिचंद’ पढ़बा-गुणबा को सुअवर मल्यो। पोथी का आदि ‘सुमरण’ सूँ लेर अंत ताँई पढ़ता हुयाँ घणो हरख होयो। अस्याँ लागी जस्याँ आपण पोथी न पढ़ऽर संदरूप लोकनाटक राजा हरिचंद के ताँई मचिंत होतो हुयो देखर्या होवाँ।

बाळपणा में शायद एक-दो बार पाटूंदा की रामलीला देखबा को अवसर मल्यो छो, जींसू थोड़ी थोड़ी वा ही मंचींय छवि स्मृति पटल पे उभरती सी लागी। पोथी का संदा संवाद पाठक के ताँई भाव-विभोर करबा की पूरी क्षमता राखे छै, अर मन में अपणे आप आगे का संवाद पढ़बा की हिवड़ा में जबरदस्त उत्कंठा पैदा करे छै। याही उत्कंठा पाठक के ताँई सरु सूँ लेर अंत ताई अविराम पोथी ने आगे सूँ आगे पढ़बा काण मजबूर करे छै। अर कसी भी भाषा की कोई भी विधा हाळी पोथी में या बात होवै तो वा पोथी मील को भाटो बण्या बना न रह सकै।

संवाद मे परयोग कर्या ग्या मायड़ भाषा का उत्कृष्टता सूँ सध्या सबद अपणी नराळी ही सोरम बखेरे छै तो संवाद का भाव को रस हिवड़ा में ग़ज़ब को रोमांच पैदा करऽर पाठक का अंतस् के ताँई झँकझोऽर म्हैल दे छै।

हाड़ौती का ईं ढ़ाई कड़ी लोकछंद में लोकनाटक सतवादी राजा हरिचंद को सुणी-सुणाई अर आधा-अधूरा, कट्या-फट्या, गळ्या पानाँ(खऽर्डा)के तांई सोर-समेटऽर पोथी का सरुप मे संपादन करबो कोई मामूली बात कोईनै। यो आपने आपणी लोक-संसकरती के ताँई सहेजबा को घणो लोठो अर जबरो काम कर्यो छै। म्हू अकिंचन जादा तो न जाणू पण जतनी हाल ताँई म्हारी समझ बणी छै, ऊँ मुताबिक आशा करुँ छूँ के आपकी ईं पोथी के ताँई अबार अर आबा हाळा टेम में गुणीजना सूँ पूरो पूरो मान-सम्मान मलेगो।

रविन्द्र बीकावत

112-बी, वीर सावरकर नगर

कोटा-324005(राजस्थान)

 

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