Friday, April 17, 2026
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भगवाधारी सीपी राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति के रूप में भारत की संप्रभुता एवं मोदी के नया भारत मुहिम को देंगे मजबूती- डॉ एन.पी.गांधी 

ऐतिहासिक जीत: संसद में राधाकृष्णन का नया युग

“तमिलनाडु से उपराष्ट्रपति तक, लोकतंत्र को मिली नई दिशा”

भारतीय लोकतंत्र के सबसे अहम संवैधानिक पदों में उपराष्ट्रपति का स्थान न केवल संसदीय व्यवस्थाओं के संचालन के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व और सामाजिक मूल्यों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। 9 सितंबर 2025 को हुए चुनाव में, कुल 781 सांसदों में से 767 ने मतदान किया, जिनमें महाराष्ट्र के राज्यपाल और एनडीए उम्मीदवार सी.पी. राधाकृष्णन को 452 वोट प्राप्त हुए। विपक्ष के बी. सुदर्शन रेड्डी को 300 वोट मिले। यह चुनाव देश के सबसे समावेशी, प्रतिस्पर्धी और बहुपक्षीय संसदीय प्रक्रियाओं में से एक रहा जिसमें व्यक्तिगत, राजनीतिक और राष्ट्रीय मूल्यों की गूंज स्पष्ट दिखी। 

सी.पी. राधाकृष्णन: उपराष्ट्रपति बनने की ऐतिहासिक जीत और देश के लिए नयी दिशाएँ

1. जीवन परिचय और शुरुआत

सी.पी. राधाकृष्णन का जन्म 20 अक्टूबर 1957 को तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले में एक साधारण परिवार में हुआ। आरंभ से ही शिक्षा और सामाजिक सेवा पर उनका ज़ोर रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में स्वयंसेवक के तौर पर सक्रिय कार्य करते हुए उन्होंने जनसेवा के जीवंत आदर्शों को अपनाया। 1974 में जनसंघ के राज्य कार्यकारिणी सदस्य बने, और यहीं से उनके सार्वजनिक जीवन की गहरी शुरुआत हुई।

2. राजनीतिक यात्रा और विविध अनुभव

राधाकृष्णन ने 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में कोयंबटूर से सांसद के रूप में जीत हासिल की, जहाँ वे वित्त, टेक्सटाइल और सार्वजनिक क्षेत्र जैसी कई समितियों से जुड़े रहे। 2004 में वे संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत के प्रतिनिधि रहे। बाद के वर्षों में भाजपा की तमिलनाडु इकाई का नेतृत्व करने के साथ उन्होंने राज्य के विकास, सामाजिक समावेश और दलित/वंचित अधिकारों के लिए उल्लेखनीय अभियान चलाया।

3. राज्यपाल के रूप में उत्कृष्ट कार्य

वे झारखंड, महाराष्ट्र, तेलंगाना और पुडुचेरी के राज्यपाल रहे। इन राज्यों में प्रशासनिक संयम, पारदर्शिता और जन कल्याण की नीति को लागू किया। राज्यपाल के पद की गरिमा को बनाए रखते हुए उन्होंने संविधान का सम्मान और समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाओं के विस्तार को प्राथमिकता दी।

4. संसदीय नेतृत्व एवं संवाद

उपराष्ट्रपति के रूप में सी.पी. राधाकृष्णन राज्यसभा के सभापति बनेंगे। यहाँ उनका दायित्व सदन की गरिमा बनाए रखना, गुणवत्तापूर्ण बहस को बढ़ाना और लोकतांत्रिक संवाद का स्तर ऊँचा करना होगा। उनकी संवाद क्षमता, समावेशी नीति दृष्टि और निष्पक्षता से उम्मीद है कि संसद में क्षेत्रीय, सामाजिक और राजनीतिक विविधताओं का सही प्रतिनिधित्व होगा।

5. प्रधानमंत्री, अध्यक्ष और राष्ट्रपति की प्रतिक्रियाएँ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उपराष्ट्रपति बनने पर राधाकृष्णन के जनसेवा, अनुभव, और देश के लिए उनके समर्पण की सराहना करते हुए सुशासन और समावेशिता की ओर बढ़ते राष्ट्र की कल्पना प्रकट की। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद में मतदान करते हुए उनके नेतृत्व कौशल और संवादशीलता की विशेष प्रशंसा की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उनके लोकतांत्रिक मूल्य, संवेदनशीलता और राष्ट्रीय समावेशिता की झलक को नए मानक के रूप में देखती है ,जो उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन की विलक्षण प्रतिभा और गुणवत्ता को दर्शाता है।

6. युवा वर्ग एवं नीति विशेषज्ञों की आशाएँ

युवाओं की दृष्टि में राधाकृष्णन उनके लिए प्रेरणा-स्त्रोत हैं। उनके नेतृत्व से संसद में संवाद की गुणवत्ता, पारदर्शिता, नीति निर्माण, रोजगार, शिक्षा, महिला अधिकार और अल्पसंख्यक सुरक्षा में ठोस सुधार की उम्मीद की जा रही है। नीति विशेषज्ञों का मानना है कि वे संसद को एक जीवंत लोकतांत्रिक मंच बना सकते हैं जहाँ हर वर्ग की आवाज़ समुचित रूप से सुनी और आगे बढ़ाई जाएगी।

7. चुनौतीपूर्ण संसद और राष्ट्रीय एकता

राधाकृष्णन का चुनाव तमिलनाडु जैसे दक्षिण भारतीय राज्य का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे क्षेत्रीय संतुलन और समावेशिता को बल मिलता है। उनके समावेशी नेतृत्व से उम्मीद है कि संसद में लोकतांत्रिक आदर्श, संवैधानिक मूल्य और संवाद की संस्कृति और मजबूत होगी।

8. नेतृत्व का दीर्घकालिक असर

सी.पी. राधाकृष्णन ने सार्वजनिक जीवन में समर्पित नीति, सहयोगी नेतृत्व और समाज सेवा की मिसालें कायम की हैं। उनकी उपस्थिति संसद में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और समावेशी विचारों का प्रसार करती है। युवाओं, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और वंचित समाज के लिए उनकी नीतियाँ उन्नति का नया द्वार खोल सकती हैं।

सी.पी. राधाकृष्णन की उपराष्ट्रपति के रूप में ऐतिहासिक जीत सिर्फ मतदान के आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में बदलाव, समावेश और नेतृत्व के नए दौर की शुरुआत है। उनकी प्रशासनिक योग्यता, संवाद और समावेशी सोच संसद के संचालन को ऊँचाइयों तक ले जाएगी। अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान मुंबई के एलुमनाई प्रबंधन एवं पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि संसद का नेतृत्व अब एक ऐसे व्यक्तित्व के पास है, जिसने गाँव-गाँव से लेकर सर्वोच्च नीति मंच तक जनकल्याण को अपना उद्देश्य माना। उनके नेतृत्व में भारत की संसदीय संस्कृति न सिर्फ विविधताओं का सम्मान करेगी, बल्कि शासन-प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित को नई पहचान मिलेगी।

प्रमुख राष्ट्रीय नेता, युवा वर्ग और नीति विशेषज्ञ सभी उनकी जीत को भारत के लिए मूल्य आधारित नेतृत्व, लोकतांत्रिक संवाद और सुशासन के नए युग की शुरुआत मानते हैं। संसद हो या समाज, अब देश को नेतृत्व मिला है, जो केवल नीति निर्माण में ही नहीं, बल्कि समाज में न्याय, समावेश और प्रगतिशीलता की संस्कृति को मजबूती देगा। उनका चुनाव राष्ट्रीय एकता, संप्रभुता और लोकतांत्रिक मूल्यों की उपलब्धि का मील का पत्थर बन चुका है, और आगामी वर्षों में यह नेतृत्व भारत को एक सशक्त, जागरूक और विश्वसनीय लोकतंत्र की दिशा में प्रेरित करता रहेगा।

 

 

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