Wednesday, February 25, 2026
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श्रीम‌द्भगवद्गीता-कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 17/24…

हर शुभ काम ॐ उच्चारण से ही शुरू करें ….

भगवान कहते हैं कि इसलिए वैदिक सिद्धांतों को मानने वाले पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ,दान और तप रूप क्रियाएं सदा “ओम” इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके ही आरंभ होती हैं।

वेदों का पाठ करने वाले जो वैदिक संप्रदाय से हैं, उनके लिए ओम का उच्चारण करना खास बताया है । वेदपाठी लोग “ओम” का उच्चारण करके ही वेद पाठ, यज्ञ, दान, तप, शास्त्र विहित क्रियाओं में प्रवृत्त होते हैं । वेद की ऋचाएं, श्रूतियां आदि ओम के उच्चारण के बिना फलवती नहीं होती अर्थात ओम के उच्चारण के बिना फल प्रदान नहीं करती हैं ।

ओम का सबसे पहले उच्चारण क्यों किया जाता है ?

ओम का उच्चारण सबसे पहले इसलिए किया जाता है क्योंकि सबसे पहले ओम प्रणव ही प्रकट हुआ है । उस प्रणव की तीन मात्राएं हैं । उन मात्राओं से त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई है और त्रिपदा गायत्री से रिक,साम और यजु, यह वेद त्रई प्रकट हुई है अर्थात यह तीनों वेद प्रकट हुए हैं। इस दृष्टि से “ओम” सब का मूल है और इसी के अंतर्गत गायत्री भी है । सबके सब वेद भी हैं । अतः जितनी वैदिक क्रियाएं की जाती हैं, वे सब “ओम” का उच्चारण करके ही की जाती हैं।

गीता श्लोक 17/25..

शुभ कार्य परमात्मा का नाम लेकर आरंभ करें ….

भगवान कहते हैं की तत् नाम से कहे जाने वाले परमात्मा के लिए ही सब कुछ है, ऐसा मानकर मुक्ति चाहने वाले मनुष्यों द्वारा फल की इच्छा से रहित होकर अनेक प्रकार की यज्ञ और तपरूप क्रियाएं तथा दान रूप क्रियाएं की जाती हैं ।

परमात्मा की प्रसन्नता के लिए बिल्कुल भी फल की इच्छा न रख कर, शास्त्रीय यज्ञ, दान, तप, आदि शुभ कर्म किए जाएं । अन्य सभी क्रियायो का “आदि” और “अंत” होता है परंतु परमात्मा तो उस क्रिया और फल भोग की समाप्ति के बाद भी परमात्मा की सत्ता नित्य निरंतर है । वह नित्य निरंतर रहने वाली भी है । अतः नित्य निरंतर रहने वाले तत्व की ही स्मृति रहनी चाहिए । नाशवान फल की तो बिल्कुल नहीं होनी चाहिए । परमात्मा का एक ही उद्देश्य रखकर उसे संसार का त्याग करके, उन्हीं का मानकर निष्काम भाव पूर्वक, उन्हीं के लिए, यज्ञ आदि उन्हीं का मान कर निष्काम भाव पूर्वक उन्हीं के लिए यज्ञ आदि शुभ कर्म करने चाहिए ।

गीता श्लोक 17/26

ईश्वरीय गुण वाले शब्दों से पहले सत् शब्द लगाया जाता है…

भगवान कहते हैं कि हे पार्थ “सत्” ऐसा यह परमात्मा का नाम सत्ता मात्र में और श्रेष्ठ भाव में प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्म के साथ-सत् शब्द जोड़ा जाता है ।

परमात्मा विद्यमान है इस प्रकार परमात्मा की सत्ता का नाम सद्भाव है । यहां भाव से पहले सत शब्द आया है । अतः भाव अब विशेषण के साथ सद्भाव बन गया है । भगवान के अनेक रूप, उनकी अनेक लीलाएं सब सद्भाव के अंतर्गत आते हैं ।

परमात्मा के अस्तित्व या होने पर को सद्भाव कहते हैं । जिसका कभी अभाव नहीं होता, वह ऐसा ही भाव है । प्राय सभी आस्तिक, यह तो मानते हैं कि सर्वोपरि, सर्व नियंता कोई विलक्षण शक्ति सदा से है और वह अपरिवर्तनशील है । जो संसार को देखते हैं, जानते हैं, वह इंद्रियां, बुद्धि आदि भी संसार के हैं । मुक्ति देने वाले सब साधन सत्य हैं और बंधन कारक सब असत हैं । असत का त्याग भी सत् ही है । सत् का ग्रहण अर्थात प्राप्ति भी सत् ही है । अतः असत् का त्याग करने पर सत् का अनुभव हो जाता है ।

गीता श्लोक 17/27…

सत् भी परमात्मा को समर्पित है….

भगवान कहते हैं कि यज्ञ तथा तप और दान रूप क्रिया में जो स्थिति अर्थात निष्ठा है, वही सत्य में कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी “सत्” ऐसा कहा जाता है ।

यज्ञ, तप और दान रूप क्रिया में जो स्थिति अथवा निष्ठा होती है, वह “सत्” कही जाती है । किसी सात्विक यज्ञ में, तप में, दान में जो निष्ठा या स्थित है, इन्हें करने की जो तत्परता है, वह “सत् निष्ठा” कहलाती है । ऊंचे से ऊंचे भोगो, स्वर्ग, भोग भूमियों को न चाह कर, केवल परमात्मा को चाहता है, वह अपना कल्याण चाहता है, मुक्ति चाहता है, ऐसे साधक का जितना परमार्थिक साधन बन जाता है, वह सब सत् हो जाता है । भगवान भी कहते हैं कि कल्याणकारी कर्म करने वाले की दुर्गति नहीं होती । परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म सदा “सत्” ही रहता है और अधर्म का त्याग करने पर भी कर्म “सत्” हो जाता है ।

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