“बाल कविता :- तरक़ीब”
जंगल के सारे जीवों को
मिला एक फ़रमान
आशंकाभारी बारिश की
सब हों सावधान
भारी बारिश की सूचना से
सभी जीव हैरान
कैसे बचेंगे इस आफ़त से
मुश्किल में है जान
मिटिंग बुलाई राजा जी ने
राजा भी हैरान
राय सभी से मांगी उसने
न हो कुछ नुकसान
अपनी-अपनी राय सभी ने
राजा को बतलाई
लेकिन राजा जी कोई
राय पसंद न आई
कोई बोला बाढ़ जो आए
पेड़ों पर चढ़ जाएं
बोला कोई ऊँचे बिल में
कंदरा में छिप जाएं
माना विपदा एक सभी की
अलग-अलग थी व्यथा
सभी पेड़ पर चढ़ नहीं सकते
सभी बिलों में छुप नहीं सकते
किसी अनिष्ठ की आशंका से
राजा था परेशान
राय मिली न कोई ऐसी
सबको मिले निदान
तभी लोमड़ी ने राजा को
इक तरक़ीब सुझाई
राजा और प्रजा दोनों को
बात बड़ी समझाई
ऊँचे-ऊँचे खड़े ये पर्वत
आख़िर कब काम आएँगे
बाढ़-तबाही जब आएगी
सब उन पर चढ़ जाएंगे
बाढ़-तबाही जब भी आए
सब ऊपर चढ़ जाएं
सर सेआफ़त के टलते ही
घर वापस आ जाएं
राजा और प्रजा दोनों को
राय पसंद ये आई
सबने साथी के स्वागत में
ताली खूब बजाई.
(स्वरचित,मौलिक,अप्रकाशित)
(सलीम “स्वतंत्र”कोटा-राज.)
(Mo.9001015278)
बाल कविता ‘तरक़ीब’-सलीम ‘स्वतंत्र’






