Tuesday, August 25, 2026
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यक्ष की प्रेयसी (मेघदूतम से)- कालीचरण राजपूत

यक्ष की प्रेयसी (मेघदूतम से)….

रचना_ के. सी. राजपूत, कोटा।

 

यक्ष देव भी बता रहे हैं, कृषि होती निर्भर मेघों पर ।

यदि पयोध तंह आसन्न रहे तो, झरने झरते हैं निर्झर।।

पूर्व और पश्च अर्णव दोनों से, पय पाते हैं ये जलधर ।।

देख कृष्णवत मेघ गगन में, होते हैं हर्षित हलधर।।

जलनिधियों से नीर चुराते, वितरित करते सारे देश ।

समता की बात सिखाते, जलधर देते यही संदेश ।।

कृपा दृष्टि यदि रहे मेघ की, चहुं ओर रहे खुशहाली,

धान्यों से हो भरी मेदिनी, लहराती खेतों में बाली ।।

वरष वरष कर रीते मेघ, तब उत्तर दिशि करते प्रस्थान ।

पुनः लौट उदधि तक जाकर, नीर का करते हैं आव्हान ।।

विशाल जलधि में विस्मृत होकर, छलके तक भरते नीर ।

प्रस्थान करो हे प्रिय घन ! मम प्रिया हो रही अधीर ।।

घन ! ले जाओ यह प्रेम पत्र, कर्म में सदा रहे हो दक्ष ।

पहुंचो शीघ्र पुरी अलका में, तृष्णा पूर्ण करें कल्पवृक्ष ।।

अर्ध कलश सम कुचों से भूषित, वह होगी मेरी भामिनि ।

दो अधरों के बीच दसन में, दमक रही होगी दामिनि।।

प्रियतमा हो रही व्यथित, बिता रही होगी बिरहा के दिन ।

कोई तरुणी मध्य रात्रि में, जैसे हो निज प्रियतम के बिन ।

रसिका त्रसित हो गई रस बिन, रसमय दिन आयेंगे कब ?

तन्हाई त्यागूंगी तब ही, प्रियतम होगा संग में जब ।।

तन्हाई त्यागूंगी तब ही, प्रियतम होगा…

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