Wednesday, February 25, 2026
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श्रीम‌द्भगवद्गीता-कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 15/15…

वेदों को जानने वाला मैं ही हूं….

भगवान कहते हैं कि मैं संपूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित हूं तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान, अपोहन अर्थात संशय आदि दोषों का नाश करने वाला हूं । संपूर्ण वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य, वेदों के तत्व का निर्णय करने वाला और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूं।

हृदय शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है सब प्रकार से भाव हृदय से ही उत्पन्न होते हैं समस्त कार्यों में भाव ही प्रधान होता है भाव हृदय से ही उत्पन्न होते हैं ।समस्त कार्यों में भाव ही प्रधान है ।भाव की शुद्धि होने से समस्त भाव क्रिया आदि की शुद्धि हो जाती है ।भाव हृदय में होने से हृदय की बहुत महत्ता है । हृदय सत्वगुण का कार्य है, इसलिए श्री भगवान हृदय में विशेष रूप से रहते हैं ।

भगवान से ही वेद प्रकट हुए हैं, अतः वे ही वेदों के अंतिम सिद्धांत को भली प्रकार बताकर , प्रचलित विरोधों का खंडन कर सकते हैं ।मैं ही वेदों को भलीभांति जानने वाला हूं।

गीता श्लोक 15/16…

संसार में दो प्रकार के जीव हैं क्षर और अक्षर…..

भगवान कहते हैं कि इस संसार में क्षर और अक्षर अर्थात अविनाशी । यह दो प्रकार के ही जीव हैं । संपूर्ण प्राणियों के शरीरों को क्षर और अक्षर कहा जाता है । जीवात्मा को अक्षर और शरीर को क्षर कहा जाता है ।

इस जगत में दो प्रकार के विभाग कह गए हैं।

एक _ शरीर आदि नाशवान पदार्थ अर्थात जड़ पदार्थ और

दो _ अविनाशी जीवात्मा अर्थात चेतन पदार्थ ।

एक तो स्पष्ट दिखने वाला शरीर है और दूसरा उसमें रहने वाला जीवात्मा है । जीवात्मा के रहने से ही प्राण कार्य करते हैं और शरीर का संचालन होता है ।महत्व शरीर का नहीं वरन उसमें रहने वाले जीवात्मा का है ।स्वरूप से जीवात्मा सदा सर्वदा निर्विकार ही है । परंतु भूल से प्रकृति और उसके कार्य शरीर आदि से अपनी एकता मान लेने से संज्ञा जीव हो जाती है, अन्यथा वह साक्षात परमात्मा तत्व ही है ।

गीता 15/17…

परमात्मा ही उत्तम पुरुष हैं..

उत्तम पुरुष तो “अन्य” है अर्थात “विलक्षण” ही है । जो परमात्मा इस नाम से कहा गया है, वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर सबका भरण पोषण करता है ।  भगवान ने तो “क्षर” और “अक्षर” दो तरह के पुरुषों का वर्णन किया है । फिर यह भी कहते हैं कि उन दोनों में से उत्तम पुरुष तो “अन्य” ही है । भगवान ने अपने को नाशवान अर्थात “क्षर” से अतीत और अविनाशी अर्थात “अक्षर” से उत्तम बताया है । परमात्मा का अंश होते हुए भी जीवात्मा की दृष्टि या खिंचाव नाशवान या “क्षर” की ओर है । इसलिए यहां भगवान को “विलक्षण” अर्थात “अलग” बताया है ।

“उत्तम पुरुष” को ही परमात्मा के नाम से जाना जाता है परमात्मा शब्द निर्गुण वाचक माना जाता है । इसका अर्थ यह होता है कि “परम श्रेष्ठ आत्मा” निर्गुण और सगुण एक ही परमात्मा है । भगवान को अव्यय कहने का तात्पर्य है कि संपूर्ण लोगों का भरण पोषण करते रहने पर भी भगवान का कोई व्यय या खर्चा नहीं होता अर्थात उसमें जरा सी भी कमी नहीं आती । वे सदा ज्यों के त्यों रहते हैं ।

गीता श्लोक 17/18..

वेदों में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं…..

भगवान कहते हैं कि मैं क्षर से अतीत हूं और अक्षर से भी उत्तम हूं । इसलिए मैं लोक में और वेद में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं ।

भगवान कहते हैं कि क्षर अर्थात प्रकृति परिवर्तनशील है और मैं नित्य निरंतर रहने वाला हूं । इसलिए मैं क्षर से सर्वथा अतीत (अलग) हूं । परमात्मा का अंश होने के कारण जीवात्मा अर्थात अक्षर कारण सहित कि परमात्मा से तत्व की एकता है, फिर भी भगवान अपने को जीवात्मा से भी उत्तम बताते हैं इसके कारण हैं_ _

एक _ परमात्मा का अंश होने पर भी क्षर अर्थात जड़ प्रकृति के साथ अपना संबंध मान लेता है और प्रकृति के गुणों से मोहित हो जाता है । जबकि परमात्मा कभी मोहित नहीं होता ।

दो _ _ परमात्मा प्रकृति को अपने अधीन करके लोक में आते हैं या अवतार लेते हैं, जबकि जीव प्रकृति के वश में होकर लोक में आता है।

तीन _ _ परमात्मा सदैव निरलिप्त रहते हैं, जबकि जीवात्मा को निरलिप्त होने के लिए साधन करना पड़ता है ।

 

गीता श्लोक 15/19

सर्वज्ञ पुरुष ही मेरा भजन करता है …..

भगवान कहते हैं कि हे भरत बंसी अर्जुन ! इस प्रकार जो मोह रहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ है, सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है।

भगवान के अनुसार जीवात्मा परमात्मा का अंश है । अतः अपने अंशी परमात्मा के वास्तविक संबंध का अनुभव करता है । उसका मोह रहित होना है । परमात्मा को तत्व से जानने में मोह ही बाधक है । संसार को तत्व से जानते ही परमात्मा से अपनी अभिन्नता का अनुभव हो जाता है और परमात्मा को तत्व से जानते ही संसार से अपनी भिन्नता का अनुभव हो जाता है । संसार को तत्व से जानने से संसार से माने हुए संबंध का विच्छेद हो जाता है और परमात्मा को तत्व से जानने से परमात्मा से वास्तविक संबंध का अनुभव हो जाता है ।

 

गीता श्लोक 15/20

प्रभु ने अपने को पुरुषोत्तम क्यों सिद्ध किया ?

भगवान कहते हैं कि हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरत वंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृत कृत्य हो जाता है ।

हे पाप रहित अर्जुन! तुम्हारे अंदर पाप नहीं है अर्थात तुम पाप रहित हो । क्योंकि तुम पाप दृष्टि से अलग हो, दूर हो । वैसे दोष दृष्टि करना पाप है । इससे अंतहकरण अशुद्ध हो जाता है । जो दोष दृष्टि से रहित है, वही भक्ति का पात्र होता है ।

गोपनीय बात भी दोष दृष्टि रहित मनुष्य के सामने ही कही जाती है । यदि दोष दृष्टि वाले मनुष्य के सामने गोपनीय बात कह दी जाए, तो उस मनुष्य पर बात का उल्टा असर पड़ता है। इससे दोष दृष्टि वाले मनुष्य की बहुत हानि होती है । यदि दोष दृष्टि वाले मनुष्य के सामने भगवान गोपनीय बातें कहें, तो उसको विश्वास नहीं होगा । वह तो सोचेगा कि भगवान तो अपनी प्रशंसा स्वयं कर रहे हैं अर्थात आत्मश्लाघी हैं ।

 

गीता अध्याय _16

देवासुरसम्पद्विविभाग योग…

श्लोक 16/01…

दैवीय संपदा प्राप्त पुरुष के लक्षण……….

भगवान बोले भय का सर्वथा अभाव, अंतःकरण की अत्यंत शुद्धि, ज्ञान के लिए योग में दृढ़ स्थित और सात्विक दान, इंद्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, कर्तव्य पालन के लिए कष्ट सजना और शरीर मन वाणी की सफलता….

भगवान कहते हैं कि जो पुरुष मुझे पुरुषोत्तम जान लेता है, वह सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है अर्थात वह मेरा अनन्य भक्त हो जाता है । अनिष्ट की आशंका से मनुष्य के भीतर जो घबराहट होती है, उसका नाम भय है और उस भय के सर्वथा अभाव का नाम अभय है । अपने वर्ण,आश्रम आदि के अनुसार कर्तव्य पालन करते हुए, उसमें भगवान की आज्ञा के विरुद्ध कोई काम न हो जाए, हमारे द्वारा शास्त्र और कुल मर्यादा के विरुद्ध कोई आचरण न बन जाए, इस प्रकार भय एक बाहरी कारण है ।

  1. इंद्रियों को पूरी तरह वश में रखना दम है । अपने ध्येय की सिद्धि के लिए भगवान के नाम का जप, गीता, भागवत, रामायण, महाभारत आदि के पठन-पाठन का नाम स्वाध्याय है ।

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