विराट रूप दर्शन…..
हमें बताओ हे प्रभू ! हो उग्र रूप में कौन ?
आप स्वयं बतलाइए, मैं रहता हूं मौन ।।
अर्जुन को बताओ यह, प्रभू आपका तत्व ।
अनेकों नमस्कार हैं, अब तो बताओ सत्व ।।
मेरी तो यह वीनती, आप समझे शंका ।
पितरों की कुरु भूमि में, अर्जुन वीर है बंका।।
उग्र रूप है आपका, आप देवों में से कौन?
प्रभू मैं नहिं जानता, नहिं जानें वे द्रोण।।
नहीं समझ में आ रहा, अब क्या होगा पार्थ।
जानें कैसे रूप को, अब तुम्हीं बताओ सार्थ ।।
समझ नहीं कुछ आ रहा, नमन करो स्वीकार ।
तरह-तरह के रूप क्यों ? किए हैं अंगीकार ।।
भयंकर ऐसे रूप में, प्रकट हुए क्यों आप ?
कौरव जन या गैर को, निगल रहे क्यों आप ?
साफ बताएं हमें प्रभु, क्यों प्रविष्ट हो रहे वीर?
योद्धा मुख में जा रहे, मन हो रहे अधीर । ।
के. सी. राजपूत, कोटा।
विराट रूप दर्शन…- कालीचरण राजपूत





