गीता श्लोक 15/07…
पुरुष को परमधाम क्यों प्राप्त नहीं होता?
भगवान कहते हैं कि इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा अर्थात स्वयं मेरा ही सनातन अंश है, परंतु वह प्रकृति में स्थित मन और पांच इंद्रियों को आकर्षित करता है अर्थात अपना मान लेता है ।
जिसके साथ जीव की तात्विक अथवा एक रूप की एकता नहीं है, ऐसे प्रकृति और प्रकृति के कार्य का नाम लोक है । आत्मा, परमात्मा का अंश है, परंतु प्रकृति के कार्य शरीर, इंद्रियां, प्राण, मन आदि के साथ अपनी एकता मानकर वह जीव हो गया है । भगवान, यह वास्तविकता प्रकट करते हैं कि जीव केवल मेरा ही अंश है । इस समय प्रकृति का जरा भी अंश नहीं है और बोध भी करते हैं कि हे जीव! तू मेरा ही अंश है । प्रकृति के साथ तेरा संबंध न कभी हुआ है और हो भी नहीं सकता और कभी होगा भी नहीं ।
गीता श्लोक 15/07…
पुरुष को परमधाम क्यों प्राप्त नहीं होता?
भगवान कहते हैं कि इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा अर्थात स्वयं मेरा ही सनातन अंश है, परंतु वह प्रकृति में स्थित मन और पांच इंद्रियों को आकर्षित करता है अर्थात अपना मान लेता है ।
जिसके साथ जीव की तात्विक अथवा एक रूप की एकता नहीं है, ऐसे प्रकृति और प्रकृति के कार्य का नाम लोक है । आत्मा, परमात्मा का अंश है, परंतु प्रकृति के कार्य शरीर, इंद्रियां, प्राण, मन आदि के साथ अपनी एकता मानकर वह जीव हो गया है । भगवान, यह वास्तविकता प्रकट करते हैं कि जीव केवल मेरा ही अंश है । इस समय प्रकृति का जरा भी अंश नहीं है और बोध भी करते हैं कि हे जीव! तू मेरा ही अंश है । प्रकृति के साथ तेरा संबंध न कभी हुआ है और हो भी नहीं सकता और कभी होगा भी नहीं ।
श्रीमद्भगवद्गीता-कालीचरण राजपूत





