ग़ज़ल
शकूर अनवर
ज़रा सा हौसला टूटा तो होश खो बैठे।
यही सबब था सफ़ीने* को हम डुबो बैठे।।
*
सभी को दर्से वफ़ा* दे रहे थे जो अब तक।
दिलों में आज वो नफ़रत के बीज बो बैठे।।
*
चले थे गेसू ए हस्ती* सॅंवारने के लिये।
किसी की ज़ुल्फ़ के लेकिन असीर* हो बैठे।।
*
उमीदो यास* के फूलों का और क्या करते।
तुम्हारे नाम की माला में सब पिरो बैठे।।
*
हम अपने दिल के सिवा अब तुम्हें कहां रक्खें।
हम अपने घर को तो इन हादसों* में खो बैठे।।
*
तेरे सितम* की शिकायत फ़िज़ूल* की हमने।
तेरे करम* से भी हम आज हाथ धो बैठे।।
*
ये इज़्तराब* की लज़्ज़त कहाँ मिली ‘अनवर”।
ये किसका तीरे नज़र*दिल में तुम चुभो बैठे।।
*
शब्दार्थ:-
सफ़ीना*नाव का बेड़ा
दरसे वफ़ा*प्रेम का पाठ
गेसू ए हस्ती*जीवन रूपी ज़ुल्फ़ें
असीर*क़ैदी बंदी
उमीदो यास*आशा और मायूसी
हादसों*दुर्घटनाओं
सितम*ज़ुल्म अत्याचार
फिजूल*व्यर्थ
करम*मेहरबानी कृपा
इज़्तराब*बेचैनी
लज़्जत*स्वाद ज़ायका
तीरे नज़र* नयन बाण
9460851271
ग़ज़ल -शकूर अनवर





