ग़ज़ल
शकूर अनवर
जब उसकी शोख़ तबीयत* पे रंग आयेगा।
उसे कुछ और मुहब्बत का ढंग आयेगा।।
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नज़र में तीर जुबाॅं में कटार है उसके।
वो साथ लेके ये सामाने- जंग आयेगा।।
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अभी तो मुझको ज़माने ने कर दिया ख़ामोश।
यही ज़माना कभी मुझसे तंग आयेगा।।
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कभी तो दार* की क़िस्मत भी सुर्ख़रू* होगी।
कभी तो बस्ती में कोई मलंग* आयेगा।।
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कहोगे शेर तो दिल का ग़ुबार निकलेगा।
रहोगे चुप तो ज़ुबानों पे ज़ंग आयेगा।।
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फिर उसके दिल की कुदूरत* ज़ुबान पर आई।
फिर उसके सर पे निदामत* का संग आयेगा।।
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जहाँ-जहाँ भी लहू से लिखोगे तुम “अनवर”।
वहीं-वहीं पे कहानी में रंग आयेगा।।
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शब्दार्थ;-
शोख़* यानी चंचल
तबीयत*स्वभाव
दार*सूली
सुर्ख़रू*कामयाब सफल
मलंग*मस्त दीवाना
ज़ंग*लोहे पर पानी पड़ने से लाल लाल से निशान पड़ना
कुदूरत*नफ़रत
निदामत*शर्मिंदगी
लहू* ख़ून रक्त
शकूर अनवर
9460851271
ग़ज़ल -शकूर अनवर





