गीता श्लोक 14/10
श्लोक अर्थ एवं संक्षिप्त भावार्थ..
यह तीनों गुण मनुष्य पर कैसे विजय प्राप्त करते हैं ?
भगवान कहते हैं कि हे भरत वंश के उद्भव अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर, सतोगुण बढ़ता है, सत्वगुण और तमोगुण को दबाकर, रजोगुण बढ़ता है, वैसे ही सतोगुण और रजोगुण को दबाकर, तमोगुण बढ़ता है ।
सत्तो गुण बढ़ता है तो वह रजोगुण और तमोगुण को दबाता है अर्थात रजोगुण के लोग प्रवृत्ति नए-नए कर्मों का आरंभ अशांति इस तरह सांसारिक भोग और संग्रह में प्रियता आदि वृत्तीय इन सबको सत्व गुण दवा देता है ।
तमोगुण के प्रमाद,आलस, अनावश्यक निद्रा, आदि वृत्तीय इन सबको सत्वगुण दवा देता है और परिणाम स्वरुप अंतःकरण में स्वच्छता, निर्मलता, वैराग्य, उदारता, निवृत्ति आदि विपत्तियों को उत्पन्न कर देता है।
रजोगुण बढ़ता है तो सतोगुण और तमोगुण की वृत्तियों को दबा देता है अर्थात सतोगुण की ज्ञान, प्रकाश, वैराग्य, उदारता आदि वृत्तियां और तमोगुण की प्रमाद, आलस, अनावश्यक निद्रा,मूढ़ता आदि वृत्तियां इन सबको रजोगुण दबा देता है और अंतहकरण में लोभ,प्रवृत्ति, आरंभ, अशांति इस तरह आदि वृत्तियों को उत्पन्न कर देता है ।
तमोगुण जब बढ़ता है तो सतोगुण और रजोगुण को दबा देता है अर्थात सतोगुण की स्वच्छता, उदारता,आदि वृत्तियां और रजोगुण की चंचलता, अशांत लोभ आदि वृत्तियां इन सबको तमोगुण दबा देता है ।
गीता श्लोक 14/11..
जब सत्वगुण बढ़ता है….
भगवान कहते हैं कि जब इस मनुष्य शरीर में सब द्वारों अर्थात इंद्रियों और अंतहकरण में प्रकाश अर्थात स्वच्छता और विवेक प्रकट हो जाता है, तब यह जानना चाहिए की सत्यगुण बढ़ा हुआ है ।
जब रजोगुण तथा तमोगुण वृत्तियों को दबाकर सत्यगुण बढ़ता है, उस समय संपूर्ण इंद्रियों में तथा अंतःकरण में स्वच्छता और निर्मलता प्रकट हो जाती है तथा मन से किसी भी विषय का ठीक-ठीक चिंतन होता है । अंतःकरण में स्वच्छता और निर्मलता आने से असत, कर्तव्य, अकर्तव्य, लाभ, हानि, हित अहित आदि बातों का स्पष्टतया ज्ञान हो जाता है ।रजोगुण और तमोगुण तो सभी शरीरों में बढ़ते हैं, परंतु सतोगुण अर्थात सत्वगुण केवल मानव शरीर में ही बढ़ता है । अतः मनुष्य को चाहिए कि वह रजोगुण और तमोगुण पर विजय प्राप्त करके सत्वगुण से ऊंचा उठे। इसी में मनुष्य जीवन की सफलता है । भगवान ने मनुष्य शरीर देखकर इन तीनों पर विजय प्राप्त करने का पूरा मौका दिया है ।
गीता श्लोक 14/12..
जब रजोगुण बढ़ता है तब….
भगवान कहते हैं कि है भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन रजोगुण के बढ़ने पर लोभ प्रवृत्ति कर्मों का आरंभ अशांति और इस तरह यह वृत्तियां पैदा होती हैं ।
जीवन को चलाने के लिए प्रत्येक मनुष्य को कुछ ना कुछ वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है, परंतु निर्वाह की वस्तुएं पास में होने पर भी उनका अधिक भंडारण करने की इच्छा को लोभ कहते हैं । परंतु वह वस्तुएं स्वाभाविक रूप से बढ़ रही हैं तो इस समय लोभ नहीं होता , जैसे खेती करना, पशुपालन, व्यापार आदि कार्यों से धन का आना लाभ नहीं है।
जीवन यापन के लिए प्रत्येक आदमी सब कुछ कार्य तो करता ही है, अतः कार्यों में लग जाने का नाम प्रवृत्ति है । राग द्वेष से रहित होकर कार्य में लग जाने में दोष नहीं है, क्योंकि ऐसी प्रवृत्ति तो गुनातीत महापुरुषों में होती है ।
गीता श्लोक 14/13..
बढ़े हुए तमोगुण को कैसे पहिचाने ?….
भगवान कहते हैं कि हे कुरु नंदन ! तमोगुण बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह यह वृत्ति भी पैदा होती हैं ।
सतोगुण की प्रकाश प्रवृत्ति को दबाकर जब तमोगुण बढ़ता है, तब इंद्रियां और अंतःकरण में स्वच्छता नहीं रहती । इंद्रियों और अंतहकरण में जो समझने की शक्ति है, वह तमोगुण के बढ़ने पर लुप्त हो जाती है । इसी वृत्ति को अप्रकाश कहा गया है ।
रजोगुण की वृत्ति, प्रवृत्ति को दबाकर जब तमोगुण बढ़ जाता है, तब काम करने का मन नहीं करता, निरर्थक बैठे रहना या लेटे रहने का मन करता है । आवश्यक कार्य को करने की रुचि नहीं होती । यह सब अप्रवृत्ति वाली वृत्ति का काम है । तमोगुण के बढ़ने पर मोह वृत्ति आ जाती है, तब अंदर विवेक विरोधी भाव आने लगते हैं । क्रिया के करने या नया काम करने में विवेक काम नहीं करता । परिणाम स्वरुप आलस छाया रहता है । इससे आर्थिक और व्यवहारिक काम करने की सामर्थ्य नहीं रहती । जब अप्रकाश और अप्रवृत्ति दिखाई दें, तब समझना चाहिए कि सतोगुन और रजोगुण को दबाया गया है, इससे तमोगुण में वृद्धि हुई है ।
श्रीमद्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत





