Saturday, April 18, 2026
IMG-20260122-WA0067
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

लोक भाषा, ब्रजभाषा…- कवि कालीचरण राजपूत

लोक भाषा, ब्रजभाषा…

 

दिन दिन उन्नति करि रही, ब्रज की भाषा आज ।

ब्रज भाषहिं गंभीर हो, लेते कवी समाज ।।

विदु जन ब्रज साहित्य की, रचना करते रोज ।

नित नई रचना करें, इससे बढ़तौ ओज ।।

लोक बचन के रूप में, बढ़ रही ब्रजभाषा ।

आप सुधीजन ध्यान दें, ऐसी ही है आशा ।।

उच्चासन थी पा चुकी, उनीस सदी के मध्य ।

कविता भी गाई गई, लिखी गई थी गद्य ।।

क्षेत्रीय शक्ति मानिए, धर्म _कर्म कौ भाउ ।

उन्नति कौ कारण भयौ, ब्रजभूमि कौ प्रभाउ ।।

काव्य विधा ब्रज की रही, गद्य कमायौ नाम ।

यह कृष्णा की भूमि है, वृंदावन सौ धाम ।।

भाषा ने पुष्टि मार्ग में, खूब कमायौ नाम ।

अग्रगण्य यह बन गई, वाकी ह्वै गई बाम ।।

वाहक बन संगीत की, फैली भारत देश ।

खूब सरस ब्रज लोग थे, ऐसौ ही परिवेश ।।

या भाषा के शब्द भी, करें बहुत श्रृंगार ।

अन्य रसन के साथ में, लगतौ है श्रृंगार ।।

काव्यात्मिकता अंग है, सहजौ मधुर स्वरूप ।

बहु विशिष्टता है यहां, निखरौ

_ निखरौ रूप ।।

[लोक वचन= लोक भाषा]

 

के. सी. राजपूत, कोटा ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles