लोक भाषा, ब्रजभाषा…
दिन दिन उन्नति करि रही, ब्रज की भाषा आज ।
ब्रज भाषहिं गंभीर हो, लेते कवी समाज ।।
विदु जन ब्रज साहित्य की, रचना करते रोज ।
नित नई रचना करें, इससे बढ़तौ ओज ।।
लोक बचन के रूप में, बढ़ रही ब्रजभाषा ।
आप सुधीजन ध्यान दें, ऐसी ही है आशा ।।
उच्चासन थी पा चुकी, उनीस सदी के मध्य ।
कविता भी गाई गई, लिखी गई थी गद्य ।।
क्षेत्रीय शक्ति मानिए, धर्म _कर्म कौ भाउ ।
उन्नति कौ कारण भयौ, ब्रजभूमि कौ प्रभाउ ।।
काव्य विधा ब्रज की रही, गद्य कमायौ नाम ।
यह कृष्णा की भूमि है, वृंदावन सौ धाम ।।
भाषा ने पुष्टि मार्ग में, खूब कमायौ नाम ।
अग्रगण्य यह बन गई, वाकी ह्वै गई बाम ।।
वाहक बन संगीत की, फैली भारत देश ।
खूब सरस ब्रज लोग थे, ऐसौ ही परिवेश ।।
या भाषा के शब्द भी, करें बहुत श्रृंगार ।
अन्य रसन के साथ में, लगतौ है श्रृंगार ।।
काव्यात्मिकता अंग है, सहजौ मधुर स्वरूप ।
बहु विशिष्टता है यहां, निखरौ
_ निखरौ रूप ।।
[लोक वचन= लोक भाषा]
के. सी. राजपूत, कोटा ।
लोक भाषा, ब्रजभाषा…- कवि कालीचरण राजपूत






