कोटा को इतिहास
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हाड़ा बूंदी जीत ली,पड़गी वांकी पार।
देवसिंह हाड़ा बण्या,बूंदी का दरबार।।
अकेलगढ मं ऊं समै,भीलां को छो राज।
कोट्यो छो गाठो घणो,ऊंकै माथै ताज।।
कोट्यो तो खटकै घणो,लेणो ऊंको राज।
जेतसिंह नै धार ली,कोसां ऊंको ताज।।
मंसा मन मं पाळ ली,बूंदी राजकुमार।
कोट्या नै जीत्यां पछै,सोवां खाट बछार।।
कोट्यो छळ ल्यो जेत नै,धोखा सूं द्यो मार।
भीलां को वू सूरमो,सरगां गयो सिधार।।
कोट्यो राजो मार कै,कबजाई सा ठाम।
मलग्यो बूंदी राज मं,अकेलगढ को धाम।।
भील बीर का नाम पै,कोटो राख्यो नाम।
सहर बणायो सोवणो,चामल को चतराम।।
रतनसिंह जी राख ल्यो,बूंदी को तो राज।
बेटा माधोसिंह नै,सूंप्यो कोटा राज।।
हाड़ा माधोसिंह जी,बणग्या सा दरबार।
राज सँभाळ्यो राव नै,खच्या अणद का तार।।
सासक माधोसिंह जी,चलग्या सरगां धाम।
हाड़ा राव मुकंद कै,आई हाथ लगाम।।
राजा राव मुकंद का,जगतसिंह छा पूत।
जगतसिंह की चेतगी,बेठ्यो वांको सूत।।
जगतसिंह कै बाद मं,बणग्या राव किसोर।
रामसिंह राजा बण्या,नाच्यो मन को मोर।।
रामसिंह का लाडला,भीम पकड़ ली डोर।
भीमसिंह भोग्यां पछै,भगती मारी जोर।।
राजपाट नै छोड कै,बण्या कान्ह का दास।
चलग्या कोटो छोड कै,बनराबन मं वास।।
अर्जुण दुर्जण कै पछै,अजीत सतरूसाल।
राजा गुमानसिंह बी,हाड़ा का छा लाल।।
तिलक कर्यो उम्मेद कै,आखर मं ब्रजराज।
आसापाला मात नै,राखी सबकी लाज।।
रचनाकार-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’
शिवपुरा,कोटा
कोटा को इतिहास-दुर्गाशंकर बैरागी ‘वैष्णव’






