Wednesday, February 25, 2026
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ग़ज़ल – शकूर अनवर 

ग़ज़ल

शकूर अनवर

 

मुहब्बत को भरोसा चाहिये था।

मुझे कुछ और झुकना चाहिये था।।

*

उमीदों का सवेरा चाहिये था।

नया सूरज निकलना चाहिये था।।

*

मेरी ऑंखों में रख दी तुमने दुनिया।

मेरी ऑंखों को सपना चाहिये था।।

*

उधर इक जादा-ए-दारो रसन है।

उसी रस्ते पे चलना चाहिये था।।

*

तुम्हारी मंज़िलें खुद पाँव छूतीं।

सफ़र में बस इरादा चाहिये था।।

*

अगर सर भी चला जाता तो जाता।

हमें हुरमत* बचाना चाहिये था।।

*

लो हमने जान दे दी उस गली में।

मुहब्बत को तमाशा चाहिये था।।

*

वो मेरे हौसले से हार बैठी।

हवा को रुख़ बदलना चाहिये था।।

*

यही थी इश्क़ की मेराज* “अनवर”।

हमें जाॅं से गुज़रना चाहिये था।।

*

शकूर अनवर

जादा-ए-दारो- रसन*सूली की तरफ़ जाने वाला छोटा रास्ता,पगडंडी

हुरमत*इज़्ज़त,आबरू

मेराज*पराकाष्ठा

9460851271

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