गीता श्लोक 14/04
शरीरों की मूल प्रकृति तो माता है..
भगवान कहते हैं कि हे कुंती नंदन संपूर्ण योनियों में प्राणियों के जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीज स्थापना करने वाला पिता हूं।
पैदा होने वाले जीव चार प्रकार के होते हैं_
एक_ जरायुज _ जेर अथवा प्लेसेंटा के साथ पैदा होने वाले जीवों को जरायुज कहते हैं ।जैसे मनुष्य, पशु, आदि ।
दो _ अंडज _ अंडे से उत्पन्न होने वाले जीवों को अंडज कहते हैं । जैसे पक्षी, सांप, छिपकली, कछुआ आदि ।
तीन _ स्वेदज_ पसीने से उत्पन्न होने वाले जीवों को श्वेदज कहते हैं । जैसे जूं, लीक आदि ।
चार_ उद्भिज _ पृथ्वी को फोड़ कर उत्पन्न होने वाले जीव अर्थात वनस्पतियों को उद्भिज कहते हैं । जैसे वृक्ष, लता, घास आदि
संपूर्ण जीवन की उत्पत्ति के चार स्थान हैं। इन चारों में से एक एक स्थान लाखों योनियों पैदा करता है ।। उन योनियों में भी अलग-अलग प्राणी पैदा होते हैं । उनकी आकृति अर्थात शरीर अलग-अलग होते हैं । 84 लाख योनिया तो शरीर के पैदा होने के स्थान हैं और उन्होंने योनियों का उत्पत्ति स्थान माता का योनी होता है । लेकिन उस मूल प्रकृति अर्थात माता में बीज स्थापित करने वाला पिता मैं हूं अर्थात उत्पत्ति का मुख्य कारण मैं हूं ।
गीता श्लोक 14/05…
उत्पन्न होने वाले जीव प्रकृति से बधते हैं…
भगवान कहते हैं कि हे महाबाहो अर्जुन! प्रकृति से उत्पन्न होने वाले सत्व, रज और तम, यह तीनों गुण अविनाशी देही अर्थात जीवात्मा को देह से बांध देते हैं । भगवान ने जिस मूल प्रकृति को मदब्रह्म नाम से कहा है, उस मूल प्रकृति से तत्व सत्व, रज और तम, यह तीनों गुण पैदा होते हैं । इन तीनों गुणों से अनंत सृष्टियां पैदा होती हैं तथा इन तीनों गुणों के अनेक भेद हो जाते हैं । परंतु गुण न तो दो होते हैं और न कम, वरन गुन तीन ही होते हैं ।
यह तीनों गुण देही को देह से बांध देते हैं । वास्तव में पुरुष ही इन तीनों गुणों के साथ संबंध जोड़कर बंध जाता है। यह देही स्वयं अविनाशी रूप से ज्यों का त्यों रहता हुआ, भी गुणों के और गुणों की वृत्तियों के अधीन होकर स्वयं सात्विक, राजस्व और तामस बन जाता है ।
गीता श्लोक 14/06 का अर्थ और भावार्थ……
सत्व गुण ही आसक्ति से आत्मा अर्थात देही को बांधता है…
भगवान कहते हैं कि हे पाप रहित अर्जुन! उन गुणों से सतो गुण निर्मल अर्थात स्वच्छ होने के कारण प्रकाशक है और निर्विकार है । वह सुख की आशक्ति से और अज्ञान की आसक्ति से देही अर्थात आत्मा को बांधता है ।
अभी तक सत्व, रज और तम तीनों गुणों की बात की जा चुकी है, इन तीनों गुणों से सत्व गुण निर्मल है अर्थात रजोगुण और तमोगुण की तरह सत्य गुण में मलीनता नहीं है वरन यह रजोगुण और तमोगुण की अपेक्षा निर्मल है, उत्तम है । निर्मल होने के कारण यह परमात्मा तत्व का ज्ञान करने में सहायक है । सत्वगुन निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला है । सत्वगुन की अधिकता होने से रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न होने वाले क्रोध,लोभ,काम आदि दोष भी साफ-साफ दिखाई देते हैं तथा इन विकारों का साफ-साफ ज्ञान हो जाता है । सत्वहीं की वृद्धि होने पर इन इंद्रियों में प्रकाश, चेतना, हल्कापन विशेषता से प्रतीत होता है । जिसमें प्रत्येक परमांर्थिक अथवा लौकिक विषय को अच्छी तरह समझने में पूरी तरह कार्य करती है और कार्य करने में पूरा उत्साह बना रहता है ।सतोगुण में परमात्मा का उद्देश्य होने से परमात्मा की तरफ चलने में स्वाभाविक रुचि होती है ।
गीता श्लोक 14/07 का अर्थ और भावार्थ…
रजोगुण का विकार….
भगवान कहते हैं कि हे कुंती पुत्र अर्जुन! तृष्णा और आसक्ति को पैदा करने वाले रजोगुण को तुम राग स्वरूप समझो । वह कर्मों की आवश्यकता से देही अर्थात आत्मा या जीवात्मा को बांधता है ।
रजोगुण राग स्वरूप है और किसी वस्तु में प्रियता पैदा होना रजोगुण का स्वरूप है । रजोगुण राग मय है । रजोगुण कर्मों की आवश्यकता से शरीरधारी को बांधता है । रजोगुण के बढ़ने पर ही ज्यों_ ज्यों तृष्णा और आसक्ति बढ़ती है, त्यों_ त्यों मनुष्य की कर्म करने की प्रवृत्ति बढ़ती है । दिन-रात कर्म करने से मनुष्य प्रवृत्ति में ही फंसा रह जाता है । उसकी मनोवृत्तियां चिंतन में लगी रहती हैं, कि नए-नए काम किए जाएं । ऐसी अवस्था में उसको अपना कल्याण का उद्धार करने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता । इस तरह रजोगुण कर्मों की सुख शक्ति से शरीरधारी को बांध देता है अर्थात जन्म _मरण की ओर ले जाता है । अतः साधक को संग्रह और सुख भोग के लिए नए-नए कर्मों का आरंभ नहीं करना चाहिए ।
गीता श्लोक 14/08 का अर्थ और भावार्थ….
तमोगुण भी बांधने में सहायक है ( बंधन में डालने में सहायक है)..
भगवान कहते हैं कि हे भारतवंशी अर्जुन ! संपूर्ण देहधारियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तुम अज्ञान से उत्पन्न होने वाला समझो । वह प्रमाद आलसी और निद्रा के द्वारा देह के साथ अपना संबंध मानने वालों को बांधता है ।
सत्वगुण और रजोगुण से_ तमोगुण को अत्यंत निकृष्ट बताया गया है । तमोगुण अज्ञान से, बेसमझी से, मूर्खता से, पैदा होता है और संपूर्ण देह को मोहित कर देता है । इतना ही नहीं, यह संसार सुखभोग और संग्रह में भी लगने देता है अर्थात राजस्व सुख में भी नहीं जाने देता । फिर सात्विक में जाने की तो बात ही नहीं आती ।
वास्तव में तमोगुण के द्वारा मोहित होने की बात केवल मनुष्यों के लिए ही है । क्योंकि दूसरे प्राणी तो स्वाभाविक ही तमोगुण में मोहित होते हैं । वे मनुष्य होते हुए भी, 84 लाख योनियों वालों के समान ही है । यह तमोगुण, प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा संपूर्ण देहधारियों को बांध देता है ।
गीता श्लोक 14/09
अर्थ और संक्षिप्त भावार्थ….
सत्व, रज और तम क्या करते हैं..
भगवान कहते हैं कि हे भरत वंश के उद्भव अर्जुन! सत्वगुण सुख में और रजोगुण कर्म में लगाकर मनुष्य पर विजय कर पाता है । परंतु तमोगुण ज्ञान को ढक कर एवं प्रमाद में लगाकर मनुष्य पर विजय करता है ।
सत्वगुण तो साधक को सुख में लगाकर अपनी विजय करता है । साधक को अपने वश में करता है अर्थात जब सात्विक सुख आता है, तब साधक की उस सुख में आशक्ति हो हो जाती है ।
रजोगुण मनुष्य को कर्म में लगाकर अपनी विजय करता है अर्थात मनुष्य को क्रिया करना अच्छा लगता है, प्रिय लगता है । मनुष्य की क्रिया के प्रति आशक्ति हो जाती है, जिससे रजोगुण मनुष्य पर विजय पाता है ।
तमोगुण के आने पर तो सतोगुण और रजोगुण दोनों ही ढक जाते हैं अर्थात तमोगुण ज्ञान को जागृत नहीं होने देता । ज्ञान को ढक कर मनुष्य को प्रमाद में लगा देता है तथा न करने योग्य कर्मों में लगा देता है । यही तमोगुण का विजई होना है ।





