ग़ज़ल
शकूर अनवर
जंग ये ज़ुल्म के मुक़ाबिल है।
कौन अब इस मुहिम में शामिल है।।
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कितनी मासूमियत है चेहरे पर।
कितना हुशियार मेरा क़ातिल है।।
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हर क़दम ज़ुल्म की फ़ज़ाओं में।
क़ाफ़िला ज़िंदगी का शामिल है।।
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फ़स्ल उगने लगी है लाशों की।
ये ज़मीं कितनी सैर-हासिल है।।
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सब नसीमे-सहर के मतवाले।
“कौन ऑंधी के अब मुक़ाबिल है”।।
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किसने समझा हयात का मक़सद।
हर कोई ज़िंदगी से ग़ाफ़िल है।।
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जो ग़मे-दिल बचा के रक्खा था।
अब वही ज़िंदगी का हासिल है।।
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हक़-परस्ती से इन्हिराफ़ “अनवर”।
या तो वो कुफ्र है या बातिल है।।
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शब्दार्थ:-
मुक़ाबिल*सामने
मुहिम*अभियान
सैर हासिल* ज़रखेज़ उपजाऊ
नसीमे सहर* सुबह की ठंडी हवा
हक़-परस्ती*सच्चाई
इन्हिराफ़*इन्कार
बातिल*झूट
शकूर अनवर
9460851271
ग़ज़ल – शकूर अनवर





