रेगिस्तान की तपती रेत हो या लद्दाख की बर्फीली चोटियाँ, जहाँ हवा में साहस गूंजता है और धरती बलिदान की कहानियाँ सुनाती है, वहाँ भारत की सीमाएँ अडिग खड़ी हैं।
पाकिस्तान में पल रहे आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने हेतु दिनाँक 6 मई 2025 मध्य रात्रि को शुरू हुआ, *”ऑपरेशन सिंदूर”* , हर भारतीय के लिए गर्व का प्रतीक है। दिनाँक 8 मई को जब पाकिस्तान की मिसाइलें आकाश को चीरती हुई भारत की ओर बढ़ीं, तो हमारी अत्याधुनिक रक्षा प्रणाली ने उन्हें हवा में ही राख कर दिया। यह जीत सिर्फ तकनीक की नहीं, बल्कि आस्था, आत्मविश्वास और देशभक्ति की ऐसी गाथा है, जो प्रत्येक देशवासी के हृदय को छूती है।
दुश्मन देश द्वारा दागी गई मिसाइलें तीर की तरह चीर रही थीं, उनका इरादा खतरनाक था। लेकिन भारत का रक्षा कवच—कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रडार इंटरसेप्टर, थर्मल ट्रैकिंग और ड्रोन निगरानी से लैस—हर खतरे को भांप लेता है। ये मशीनें नहीं, भारत की आँखें हैं, जो रात-दिन सीमाओं की हिफाज़त करती हैं। पर इनके पीछे असली नायक हैं हमारे वीर जवान। प्लस 50 डिग्री की तपन हो या माइनस 20 डिग्री की ठंड, वे अडिग रहते हैं, अपने दिल में मातृभूमि की रक्षा का संकल्प लिए। और फिर, वह आस्था—एक ऐसी शक्ति, जो किसी *”आध्यात्मिक रक्षा कवच”* से कम नहीं।
राजस्थान के तपते रेगिस्तान में *तन्नोट माता मंदिर* की घंटियाँ युद्ध के शोर में भी गूंजती हैं। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तान ने इस मंदिर पर 3,000 से ज्यादा गोलियाँ दागीं, पर एक भी दीवार को नहीं छू सकी। संयोग? चमत्कार? हमारे जवान इसे आस्था कहते हैं—विश्वास कि कोई शक्ति उनकी रक्षा कर रही है। आज भी कोई सैनिक सीमा पर कदम रखने से पहले तन्नोट माता के चरणों में सिर झुकाता है, उनके आशीर्वाद से हौसला पाता है।
बीकानेर में *करणी माता का मंदिर* सैनिकों को साहस व आध्यात्मिक ऊर्जा देता है। जम्मू-कश्मीर में *बाबा हरभजन सिंह की चौकी* —1968 में शहीद हुए एक सैनिक की याद—आज भी जीवित है। उनकी वर्दी सजाई जाती है, उनकी चौकी तैयार की जाती है, उनके लिए भोजन परोसा जाता है। सैनिक कहते हैं, बाबा आज भी पहाड़ों में गश्त लगाते हैं, उन्हें खतरे से आगाह करते हैं। ये मंदिर और चौकियाँ सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि वह पवित्र ठिकाने हैं, जहाँ सैनिकों को विश्वास की वह शक्ति मिलती है, जो उनके भीतर जोश की ज्वाला जलाती है।
लेह-लद्दाख की बर्फीली ऊँचाइयों पर *”रेज़ांग ला युद्ध स्मारक”* एक तीर्थ बन चुका है। दिनाँक 18 नवंबर 1962 के भारत-चीन युद्ध में मेजर शैतान सिंह और उनके 120 जवानों ने 1,300 चीनी सैनिकों से टक्कर ली। संख्या में कम, हौसले में अडिग, उन्होंने आखिरी सांस तक लड़ाई लड़ी। यह सिर्फ शौर्य की कहानी नहीं, बल्कि आस्था और देशभक्ति का ऐसा संगम है, जो असंभव को संभव कर देता है। कारगिल की बर्फीली वादियों में, 1999 के युद्ध में, “जय बजरंग बली” की गूंज ने सैनिकों को जीवित रखा। कई जवान बताते हैं कि रात के अंधेरे में जैसे किसी शक्ति ने उन्हें समय रहते सतर्क किया, जिससे वे दुश्मन की गोलियों से बच गए।
यह आस्था सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि वह अग्नि है, वह *आध्यात्मिक रक्षा कवच* है जो सैनिकों को निडर बनाती है। जब कोई जवान शहीद होता है, तो उसके गाँव में सिर्फ चिता नहीं जलती, एक ज्योति प्रज्वलित होती है—जो दूसरों को देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देती है। यही वजह है कि हमारे सैनिक बिना डरे, बिना रुके, सीमा पर डटे हैं। उनका मन कहता है, “माँ का आशीर्वाद साथ है, गीता का ज्ञान साथ है, तो डर कैसा?”
भारत की मिसाइल रक्षा प्रणाली, ड्रोन इंटरसेप्शन, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित सतर्कता तंत्र हमारी सीमाओं को अभेद्य बना रहे हैं, पर इस रक्षा का मूल है—वह अटूट विश्वास। एक सैनिक अपनी माँ, बहिनों के द्वारा किए विजय तिलक, रक्षा सूत्र पर उतना ही भरोसा करता है, जितना अपने रडार पर। बुलेटप्रूफ जैकेट के नीचे बंधा लाल धागा उसके दिल को मातृभूमि से जोड़ता है। बंदूक का ट्रिगर खींचने से पहले माँ दुर्गा, बजरंग बली का नाम उसके होंठों पर होता है। और हर रात, एक दीपक उस अदृश्य दैवीय, आध्यात्मिक शक्ति के लिए जलता है—जो दिखती नहीं, पर हमेशा साथ होती है।
यह है 2025 के शक्तिशाली भारत की सेना—जहाँ तकनीक, पराक्रम, सेना का प्रचंड मनोबल, आध्यात्मिक विश्वास व परंपरा, देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च समर्पण का अटूट विश्वास, प्रत्येक सैनिक की बलिदानी आत्मा को अनवरत शक्ति प्रदान करते हैं।
“ऑपरेशन सिंदूर” सिर्फ आतंकवाद के एक जीत की शुरुआत ही नहीं, बल्कि उस प्रचण्ड शौर्य का महोत्सव है, जो हमारे सैनिकों की रगों में दौड़ता है। ऑपरेशन सिंदूर में कर्नल सोफिया कुरेशी, विंग कमांडर व्योमिका सिंह के नेतृत्व में जारी माँ दुर्गा की सामूहिक शक्ति के प्रतीक बनते हुए आतंकवाद का सफाया कर रहे माँ भारती के जाबांज वीरों को, उनकी आस्था को, और उनकी अटूट हिम्मत को बार-बार नमन
✍️डॉ. सुरेश पाण्डेय, डॉ विदुषी शर्मा नेत्र चिकित्सक, कोटा






