सांगोद में न्हाण खाड़ा अखाड़ा चौबे पाड़ा की बादशाह की सवारी के साथ पांच दिवसीय लोकोत्सव का समापन हुआ। बादशाह की सवारी देखने हर बार की तरह लोगों का सैलाब उमड़ा। सवारी के मार्ग गायत्री चौराहा से खाड़ा स्थल तक लोगों की भीड़ रही। सजे-धजे घोड़ों पर सवार राजसी परिधानों में सजे उमरावों के साथ निकली बादशाह की सवारी में परम्परागत स्वांगों के साथ नए स्वांगों ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। शाम पांच बजे बपावर रोड स्थित गायत्री चौराहा से शुरू हुई बादशाह की सवारी गांधी चौराहा, तहसील बाजार, पुराना बाजार व गढ़ चौक होते हुए खाड़ा स्थल पहुंची। पूजा-अर्चना के साथ न्हाण लोकोत्सव का समापन हुआ। सवारी में एहतियातन बड़ी संख्या में पुलिस के जवान मुस्तैदी से डटे रहे। सादा वर्दी में भी पुलिसकर्मियों ने भीड़ में व्यवस्था की कमान संभाली
कथाओं के अनुसार सांगोद पहले एक खेड़ा’ था, जिसके मुखिया सांगा गुर्जर थे। जब दो जातियों के पटेलों ने उन पर आक्रमण किया तो धोखे से उनका सिर काट दिया गया। किंतु उनका धड़ तब भी युद्ध करता रहा। आज भी सांगा का सिर प्रतिमा के रूप में पूजनीय है। इसी की स्मृति में बारह भाले की सवारी और अमर शहीदी निशान निकाला जाता है। कहा जाता है कि जब कोटा रियासत बूंदी से अलग हुई, तब राजा माधोसिंह की पदवी के जश्न में सांगोद के कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। प्रसन्न होकर राजा ने नक्कारे की जोड़ी भेंट की तथा सांगोद में भी राजसी ठाठ-बाठ से बादशाह की सवारी निकालने की अनुमति दी। इसके बाद शाहजहां के काल में सांगोद के चौधरी और नीलगर परिवारों को भी शाही लवाजमे के साथ सवारी निकालने की अनुमति दी तब से यहां दो पक्ष बने। पहले न्हाण उत्सव की सवारी एक ही दिन निकाली जाती थी, जिससे झगड़ों की स्थिति बनती थी। इस समस्या को सुलझाने के लिए अंग्रेजी सरकार के कोटा रियासत के एजेंट बर्टन ने इसे दो हिस्सों में बांटा। इस निर्णय के तहत दूज को दोनों पक्षों की घुघरी रस्म, तीज व चौथ को बाजार पक्ष का न्हाण, और छठ व सप्तमी को खाड़ा पक्ष का न्हाण निर्धारित किया गया। यही परंपरा आज भी जारी है






