एक ओर तो पूरी दुनिया और देश के वैज्ञानिक बिगडते जलवायु संतुलन पर चिन्ता व्यक्त कर जंगल बढाने की योजना बना रहे है। वहीं दूसरी ओर राजस्थान के बारां जिले में स्थित दूसरे बड़े वन क्षेत्र किशनगंज शाहाबाद में धीरे-धीरे सिकुड़ते वन क्षेत्र को लेकर लगातार चिन्ता व्यक्त की जा रही है।
ऐसे हालात में जहां प्रतिवर्ष राज्य सरकार और स्वंयसेवी संस्थाएं लाखों की संख्या में पौधारोपण कर जंगल के विस्तार में अपनी भागीदारी निभा रही है।
वहीं केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा शाहबाद के घने जंगलों में विकास के नाम पर बिजली पावर प्लांट को मंजूरी देकर सवा लाख से अधिक पेड़ों की कटाई करवाई जानी है।
क्योंकि यह जंगल संरक्षित वन क्षेत्र के साथ- साथ चीता अभ्यारण्य तथा बेश कीमती आयुर्वेदिक जडी-बूटियों के लिए ख्यातनाम है। पारिवारिक वानिकी संभाग संयोजक भुवनेश मानव ने बताया कि इस जंगल के विनाश को लेकर उठ रहे विरोध में पर्यावरण प्रेमियों, सामाजिक संस्थाओं व व्यापार महासंघो सहित जिले के अन्य कई संगठनों ने में भी गहरी चिन्ता व्यक्त की है।
साथ ही बताया कि विकास का कई विरोध नहीं होता है लेकिन विकास के नाम पर विनाश वह भी वहां जहां पर सैकड़ों की संख्या में वन्यजीव, सवा लाख पेड़, पुरासम्पदा सहित पर्यावरण का विनाश हो रहा हो, ऐसे में विकास का विरोध होना स्वाभाविक है। सभी पर्यावरण प्रेमियों ने राज्य व केन्द्र सरकार से मांग करते हुए सवा लाख पेड़ों को बलि से रोकने की दिशा में पावर प्लाण्ट प्रबन्धकों से चर्चा कर ऐसा कोई विकल्प तैयार हो कि विकास भी हो और वनों का विनाश भी नही हो क्योंकि यह क्षेत्र घने जंगलों की दृष्टि से हाड़ौती का चौरापूंजी क्षेत्र कहा जाता है। इस जंगल में पेड़ों की कटाई को कतई बर्दाश्त नही किया जाएगा।
संभाग भर के पारिवारिक वानिकी कार्यकर्ताओं व पर्यावरण प्रेमी एकजुट होकर संभाग भर में हो रहे वनों के विनाश के खिलाफ अभियान चलाकर चला कर विरोध प्रदर्शन होगा
शाहाबाद इलाके में वन सम्पदा की कोई कमी नहीं है और न पहले वन्यजीवों की कमी रही, लेकिन सरकारी उपेक्षा से जहां कई वन्यजीव समीपवर्ती मध्यप्रदेश में पलायन कर गए वहीं वन सम्पदा बहुत खास होते हुए भी उपेक्षित है। एक ओर सीमा से सटकर मध्यप्रदेश का कुनो पालपुर अभयारण्य व माधव नेशनल पार्क है जहां वन संरक्षण व विकास के कई काम हुए तो दूसरी ओर हमारे जंगलों को संरक्षित घोषित तो कर दिया गया
लेकिन साधन संसाधन ही नहीं है। ऐसे में हजारों बीघा जंगलात पर अतिक्रमण हो चुके तो अब एक लाख से अधिक पेड़ों की बलि देने की तैयारी की जा रही है। बीते दशकों में जंगलात पर कब्जे को लेकर कई प्रभावशाली भी वन सम्पदा को नुकसान पहुंचाने में पीछे नहीं रहे हैं। अब जनता की मांग है कि शाहाबाद-किशनगंज के जंगलों को बचाया जाए।
– शाहाबाद को नहीं बनाया अभयारण्य
जिले में वन विभाग (प्रादेशिक वन मंडल) के अधीन कोई अभयारण्य ही नहीं है। शेरगढ़ अभयारण्य भी वन्यजीव मंडल कोटा के अधीन है। शाहाबाद को अभयारण्य बनाने के प्रस्ताव वर्षों पहले भेजे गए थे। तब ऊपर से कहा गया कि इसकी जगह कंजरवेशन रिजर्व के प्रस्ताव भेजे जाएं। इसके बाद 19 हजार हैक्टेयर वन क्षेत्र व 17 हजार हैक्टेयर वन क्षेत्र, दो हिस्सों को कंजरवेशन रिजर्व बनाने के प्रस्ताव भेजे गए थे। पिछले साल शाहाबाद के दो हिस्सों को कंजरवेशन रिजर्व बनाया गया। इसी कंजरवेशन रिजर्व के एक हिस्से में भी पेड़ों को काटा जाएगा।
– पर्यावरण प्रेमियों की जल्द होगी बैठक
शाहाबाद में पेड़ काटने का कई स्तर पर विरोध हो रहा है। जिले के पर्यावरण प्रेमियों की एक बैठक जल्द होने जा रही है। इसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी। पर्यावरण प्रेमी भानु पोरवाल ने बताया कि बैठक में सभी पर्यावरण/प्रकृति प्रेमियों को आमंत्रित किया गया है।
– उपयुक्त खबर विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित जानकारी के आधार पर ली गई है*






