” साहित्य में नारी सौंदर्य एवं श्रंगार विवेचना”
लेखक राम मोहन कौशिक की कलम से
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साहित्य लेखन ईश्वर प्रदत्त शक्तियों के कारण ही सम्भव हो पाता है । जब कोई साहित्यकार लेखक अपना सृजन प्रारम्भ करता है तो उसके पास लेखन की कई विधा होती हैं जैसे गद्य , पद्य और चम्पू इत्यादि । इन विधाओं को विस्तृत रूप से देखें तो ये काव्य (कविता), कहानी, नाटक, निबन्ध, संस्मरण, कविता व पद्य का मिश्रण भी हो सकती हैं । किसी भी विद्या में लेखक अपना सृजन करें, परन्तु वे नारी के सौंदर्य व श्रंगार का वर्णन लगभग अवश्य करते हैं । नारी की ईश्वर प्रदत्त उत्कृष्ट छवि का वर्णन यदि उनके लेखन में न हो तो लेखन में नीरसता आ जाती है ।
** नारी में ईश्वर द्वारा दी गई शक्तियों में कला, लज्जा, शालीलनता व ममता प्रमुख हैं । नारी सदैव भाव व सृजन प्रदान होती है । इन्हीं गुणों के कारण नारी के पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है । यही गुण नारी के आभूषण एवं सुन्दरता के रूप में जाने जाते हैं । नारी के सौंदर्य को दो प्रकार सें आंका जाता है । एक तो बाह्य तौर पर उसका रंग रूप, श्रंगार चेष्टाएँ, आभूषण, परिधान व बनने संवरने की कला से सुन्दरता बढ़ती है । जबकि आन्तरिक तौर पर उसका शील स्वभाव, कर्म, उदारता, नम्रता आदि का वर्णन होता है । एक सुन्दर या खूबसूरत महिला शालीनता व आत्म विश्वास का प्रतीक होती है ।
** रीतिकाल के साहित्य में नारी सौंदर्य का वर्णन अधिकता से मिलता है । संस्कृत साहित्य में स्त्री व पुरुष दोनों को समान रूप सौंदर्य वर्णन हेतु स्थान मिला है । नल – दमयन्ती कथा में दमयन्ती को जितना सुन्दर बताया गया है उतना ही नल को भी बताया गया है । हिन्दी साहिल्य सीता-राम, राधा – कृष्ण की सुन्दरता के वर्णन से भरा पड़ा है । प्रचलित लोक साहित्य व लोक मान्यताओं में भी नारी के विभिन्न रूपों की सुन्दरता का वर्णन एवं दर्शन मिलता है । वह देवी,प्रेयसी, बहिन,माता,भागिनी,राक्षसी जैसे महान किरदारों में वर्णित की गई है ।
** भारतीय साहित्य में भी नारी सौंदर्य व सुन्दरता का बहुतायत से वर्णन किया गया है । सोलह श्रंगार में मुख्यतया विंदी, हार, झुमके, बालों में फूल,अंगूठी,चूड़ियाँ, बाजू बन्द, कमर बन्द, पायल, बिछिया, मेहन्दी, काजल,उबटन,इत्र,चन्दन, ऊपरी व निचले परिधान शामिल हैं । सोलह श्रंगार में महिला द्वारा सर से पैर तक किए गये श्रंगार में सुहाग की एक न एक निशानी अवश्य पहनी जाती है । सुहागनों का सोलह श्रंगार में विशेष महत्व होता है । साहित्य में स्त्री सौंदर्य को प्राकृतिक उपमाओं से भी अलंकृत किया गया है । कालीदास ने भी शंकुतला व मेघदूतम में अलंकारिक भाषा का प्रयोग किया है ।
** प्राचीन काल में राज कुमारी के साज श्रंगार कई साहित्य में विस्तृत वर्णन करके बताये गये हैं । राजकुमारियों की सुन्दरता बढ़ाने हेतु ईश्वर प्रदत्त सुन्दर शरीर पर उबटन लगाना, मेहन्दी लगाना, सजना, संवरना, उत्कृष्ट परिधान पहनना , विमिन्न प्रकार के आभूषण पहनना इत्यादि का वर्णन मिलता है । नारी की सुन्दरता में उसके द्वारा लाज,शर्म, गोपनीयता का पालन करना भी अत्यंत आवश्यक है । स्त्री को ईश्वर ने जो सुन्दरता प्रदान की है उसका शालीन तरीके से एवं नियत स्थान पर ही प्रदर्शन होना चाहिये । नारी देवी, जननी, सृजन कर्ता , शक्ति स्वरूपा है यह बात सभी के ध्यान देने योग्य है । हम सभी को नारी का यथा शक्ति सम्मान करना चाहिए ।
** फिल्मों के आने के बाद नारी श्रंगार व सौंदर्यता में अश्लीलता आने लगी । नारी के वस्त्र कम दिखाये जाने लगे । सौंदर्य प्रसाधन के भी आधुनिक तरीके ब्यूटी पार्लर में परिवर्तित हो गया । आजकल तो फिल्मों में द्विअर्थी शब्दों का प्रयोग बहुतायत से होने लगा है, जो कि चिन्तनीय है । परन्तु हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि औरत ईश्वर की सर्व श्रेष्ठ रचना है । स्त्री को दिये गये शारीरिक सौंदर्य में ईश्वर ने कोई कमी नहीं छोड़ी । परन्तु प्रेम के मामले में स्त्री स्वयं ही छली गई । सभी प्रकार के साहित्य में स्त्री सौंदर्य का इतना अधिक वर्णन मिलता है कि उसके सामने पुरुष सौंदर्य तो नगण्य समान है।
** समाज सेवा और साहित्य में महिलाओं की भूमिका का भी विशेष महत्व है । महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, शिवानी, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, प्रेमा खेतान, मैत्रैयी पुष्पा,चित्रा मुदगल ,उषा प्रियवंदा,अलका सरावगी कुछ मुख्य महिला साहित्यकारों के नाम हैं । इन सभी ने नारी के सौंदर्य एवं श्रंगार को विभिन्न विधाओं में समाज के सामने रखा है ।
** साहित्य के क्षेत्र में नारी सौंदर्य एवं श्रंगार की जब बात की जाती है तो हमें सिक्के के दूसरे पहलू पर भी विचार करना होगा । पाश्चात्य सभ्यता अनुसरण एवं नारी श्रंगार हेतु ब्यूटी पार्लर की इस दौड़ में नारी श्रंगार का रूप न बिगाड़ा जाये । साहित्यकारों को भी इस प्रकार के भरपूर प्रयास करने चाहिए कि नारी के ईश्वर प्रदत्त रूप को अश्लीलता में परिवर्तित न होने दें ।
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राम मोहन कौशिक
सेवा निवृत एक्सईएन रेलवे एवं लेखक
कोटा ,राजस्थान ।






