धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों का जन्म ..
(महाभारत /आदि पर्व / संभव पर्व / गांधारी पुत्र प्राप्ति /अध्याय_ 114 पर आधारित)
क्षुधा तृषित हो व्यास जी, आए धृत के पास ।
पाया भोजन पेट भर, जुड़ी सांस से सांस ।।
सुबल-सुता को व्यास ने, दिया एक वरदान ।
पाओगी तुम एक सौ, धृत के पुत्र महान ।।
गर्भ हुआ दो वर्ष का, उदर पल रहा लोथ ।
बहुत समय हुआ उदर में, कष्ट दे रहा कोख ।।
प्रसव बाद सींचा गया, पिंड बना वह मांस ।
उदर से बाहर आ गया, नहीं आई थी सांस ।।
खंड किये उस पिंड के, रखा घृत कलश में ।
एक सौ भाग पिंड के, सजा दिए कलश में ।।
शेष भाग भी पौढ़ाया, बचा एक था खंड ।
पात्र सुरक्षित कर दिए, ना देख सके मार्तंड ।।
एक खंड बचा था शेष, रखा इसे गागर में ।
अंतिम इच्छा पुत्री की, पूरी हुई गागर में ।
सौ कलश से पुत्र एक सौ, एक से पुत्री एक ।
जन्म सभी संतान का, व्यास रहे थे देख ।।
तनय थे कौरव एक सौ, बेटी दुःशला एक ।
कौरव तनय न संत थे, कर्म न करते नेक ।।
वैश्य दासी घृतराष्ट्र से, तनय हुआ था एक ।
दासी के सहयोग से, काम किया नहीं नेक ।।
दुर्योधन ने लिया जन्म, बोले जीव श्रगाल ।
इसी तनय के जन्म से, बिगड़ेंगे सब हाल ।।
राजन मानो बात यह, इसको दीजो त्याग ।
ऐसे तो खुल जाएंगे, भरत वंश के भाग ।।
अशुभ को न्योता दिया, दुष्ट को रखा पास ।
शेष बची जो बात थी, धूमिल हो गई आस ।।
कौरव सब मारे गए, युयुत्सु बच गया शेष ।
रक्षक श्री भगवान हैं, उसका भाग्य विशेष ।।
प्रभु सदा करते कृपा, जो परिचारक होय ।
बिना कृपा, सानिध्य में, पहुंच न पाए कोइ ।




