Tuesday, April 21, 2026
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धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों का जन्म ..- कवि कालीचरण राजपूत

धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों का जन्म ..

 

(महाभारत /आदि पर्व / संभव पर्व / गांधारी पुत्र प्राप्ति /अध्याय_ 114 पर आधारित)

 

क्षुधा तृषित हो व्यास जी, आए धृत के पास ।

पाया भोजन पेट भर, जुड़ी सांस से सांस ।।

सुबल-सुता को व्यास ने, दिया एक वरदान ।

पाओगी तुम एक सौ, धृत के पुत्र महान ।।

गर्भ हुआ दो वर्ष का, उदर पल रहा लोथ ।

बहुत समय हुआ उदर में, कष्ट दे रहा कोख ।।

प्रसव बाद सींचा गया, पिंड बना वह मांस ।

उदर से बाहर आ गया, नहीं आई थी सांस ।।

खंड किये उस पिंड के, रखा घृत कलश में ।

एक सौ भाग पिंड के, सजा दिए कलश में ।।

शेष भाग भी पौढ़ाया, बचा एक था खंड ।

पात्र सुरक्षित कर दिए, ना देख सके मार्तंड ।।

एक खंड बचा था शेष, रखा इसे गागर में ।

अंतिम इच्छा पुत्री की, पूरी हुई गागर में ।

सौ कलश से पुत्र एक सौ, एक से पुत्री एक ।

जन्म सभी संतान का, व्यास रहे थे देख ।।

तनय थे कौरव एक सौ, बेटी दुःशला एक ।

कौरव तनय न संत थे, कर्म न करते नेक ।।

वैश्य दासी घृतराष्ट्र से, तनय हुआ था एक ।

दासी के सहयोग से, काम किया नहीं नेक ।।

दुर्योधन ने लिया जन्म, बोले जीव श्रगाल ।

इसी तनय के जन्म से, बिगड़ेंगे सब हाल ।।

राजन मानो बात यह, इसको दीजो त्याग ।

ऐसे तो खुल जाएंगे, भरत वंश के भाग ।।

अशुभ को न्योता दिया, दुष्ट को रखा पास ।

शेष बची जो बात थी, धूमिल हो गई आस ।।

कौरव सब मारे गए, युयुत्सु बच गया शेष ।

रक्षक श्री भगवान हैं, उसका भाग्य विशेष ।।

प्रभु सदा करते कृपा, जो परिचारक होय ।

बिना कृपा, सानिध्य में, पहुंच न पाए कोइ ।

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