लोकतंत्र के नाम पर भ्रम की राजनीति या मतदाता सूची की शुचिता? जयपुर की पदयात्रा ने छेड़ी नई बहस!
‘ जयपुर की पदयात्रा से विपक्ष को भाजपा की खुली चुनौती,जनादेश का सम्मान कीजिए, संस्थाओं पर सवाल उठाने से पहले तथ्यों के साथ आइए’
✍️डॉ. नयन प्रकाश गांधी पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक
लोकतंत्र केवल सत्ता हासिल करने का रास्ता नहीं, बल्कि जनता के फैसले को स्वीकार करने, संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करने और असहमति को मर्यादा के साथ व्यक्त करने की व्यवस्था है। लेकिन जब चुनावी परिणाम मनमाफिक न हों तो लोकतंत्र की चिंता अचानक सड़कों, नारों और राजनीतिक अभियानों में दिखाई देने लगती है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र की रक्षा केवल राजनीतिक सुविधा के समय याद आती है? जयपुर के रामलीला मैदान से निकली भाजपा की ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा ने इसी सवाल को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया।
5 नवंबर को रामलीला मैदान में आयोजित जनसभा और उसके बाद न्यू गेट से त्रिपोलिया गेट तक निकली पदयात्रा महज एक पार्टी कार्यक्रम नहीं थी। यह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रही राजनीतिक बहस का सार्वजनिक मंच बन गई। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, केंद्रीय रेल एवं सूचना-प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़, प्रदेश प्रभारी संजय भाटिया और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने कार्यक्रम को राजनीतिक महत्व दिया। बड़ी संख्या में पहुंचे कार्यकर्ताओं ने संगठन की सक्रियता और शक्ति का प्रदर्शन किया।

लोकतंत्र की बात है तो इतिहास से भी आंख मिलाइए
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपने संबोधन में कांग्रेस को उसके शासनकाल की याद दिलाते हुए वर्ष 1975 के आपातकाल और संविधान के अनुच्छेद 356 के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया। उनका तर्क था कि जिस दल के शासन में आपातकाल लगाया गया और विपक्षी सरकारों को बर्खास्त करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल हुआ, उसे लोकतंत्र पर सवाल उठाने से पहले अपने राजनीतिक इतिहास का जवाब देना चाहिए।मुख्यमंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उदाहरण भी रखा। एक वोट से सरकार गिरने के बाद भी वाजपेयी ने संसदीय मर्यादा का पालन करते हुए इस्तीफा दिया था। यह प्रसंग भारतीय लोकतंत्र की उस परंपरा की याद दिलाता है जिसमें सत्ता से अधिक महत्व संवैधानिक प्रक्रिया और जनादेश को दिया जाता है।
मुख्यमंत्री ने कांग्रेस के शासनकाल में आरपीएससी, जल जीवन मिशन और कुछ पूर्व अधिकारियों तथा पदाधिकारियों से जुड़े मामलों का उल्लेख कर पूर्ववर्ती सरकार पर सवाल उठाए। इन आरोपों और मामलों का अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगा, लेकिन राजनीतिक जवाबदेही का सवाल अपनी जगह महत्वपूर्ण है। विपक्ष को भी इन सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए और सत्ता पक्ष को भी आरोपों को प्रमाणित करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
अश्विनी वैष्णव का सवाल—बहस संसद में हो, भ्रम के मंचों पर नहीं
केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एसआईआर को लेकर कांग्रेस के विरोध पर सवाल उठाते हुए कहा कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कोई नई प्रक्रिया नहीं है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और चुनावी संस्थाओं पर उठाए जाने वाले सवालों का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग-अलग चुनावों में अलग-अलग दलों को जनता ने अवसर दिया है, लेकिन चुनावी परिणामों के आधार पर संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करना उचित नहीं है।
वैष्णव ने कांग्रेस को संसद में बहस करने की चुनौती दी और कहा कि सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। संविधान की प्रति हाथ में रखना पर्याप्त नहीं, उसकी भावना को समझना और उसका पालन करना भी जरूरी है। यह बात विपक्ष के लिए एक राजनीतिक चुनौती है। यदि किसी प्रक्रिया में खामी है तो उसे दस्तावेजों, तथ्यों और वैकल्पिक सुझावों के साथ संसद में उठाया जाना चाहिए। केवल आरोपों की पुनरावृत्ति से लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा मजबूत नहीं होता।
मदन राठौड़ और राज्यवर्धन राठौड़ ने भी साधा विपक्ष पर निशाना
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने विपक्ष पर सत्ता में लौटने की बेचैनी में राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता का वातावरण बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कांग्रेस की राजनीतिक कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि विपक्ष को जनादेश का सम्मान करना सीखना चाहिए। वहीं, कैबिनेट मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने लोकतंत्र की असली ताकत जनता के विश्वास और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता को बताया। उनका कहना था कि चुनावी प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठाकर अविश्वास का वातावरण बनाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में नहीं है।जयपुर सांसद मंजू शर्मा ने कार्यक्रम की तैयारियों और जनसभा के संदर्भ में पहले ही कहा था कि भाजपा एसआईआर को लेकर जनता के बीच अपना पक्ष रखेगी। उनका आरोप था कि कांग्रेस इस प्रक्रिया को लेकर भ्रम फैला रही है। सभा में विधायक गोपाल शर्मा ने भी उद्बोधन दिया। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं और संगठन की भागीदारी ने कार्यक्रम को राजनीतिक ऊर्जा दी। रामलीला मैदान में विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और सिविल लाइंस विधानसभा क्षेत्र से सेवा भवन की ओर से पहुंचे कार्यकर्ताओं का उत्साह इस आयोजन की संगठनात्मक व्यापकता को दर्शाता रहा।
विपक्ष का काम सवाल उठाना है, लेकिन सवालों के साथ सबूत भी जरूरी
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका को कमतर नहीं आंका जा सकता। सरकार से सवाल पूछना, नीतियों की आलोचना करना और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर निगरानी रखना विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है। लेकिन आलोचना और अविश्वास फैलाने के बीच एक स्पष्ट अंतर है। यदि कांग्रेस को एसआईआर में कोई अनियमितता दिखाई देती है तो उसे निर्वाचन आयोग के सामने ठोस उदाहरण रखने चाहिए। जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने का दावा है, उनके दस्तावेज और संबंधित विवरण सामने लाने चाहिए। साथ ही यह भी बताना चाहिए कि प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए उसका अपना व्यावहारिक सुझाव क्या है।
दूसरी ओर, भाजपा और सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। मतदाता सूची का शुद्धिकरण तभी सार्थक है जब कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो। किसी अपात्र नाम को हटाने के साथ-साथ पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रखना भी उतना ही आवश्यक है। निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता, आपत्ति दर्ज कराने का अवसर, समयबद्ध सुनवाई और शिकायतों का निष्पक्ष निस्तारण सुनिश्चित होना चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती राजनीतिक दावों से नहीं, नागरिक के वास्तविक अधिकारों की सुरक्षा से तय होती है।
नारे नहीं, जनविश्वास की कसौटी पर खरा उतरना होगा_
जयपुर की पदयात्रा ने कांग्रेस के सामने राजनीतिक सवाल रखे हैं, लेकिन इस आयोजन ने भाजपा के सामने भी एक कसौटी रखी है। लोकतंत्र बचाने का दावा करने वाली पार्टी को अपने शासन में संस्थाओं की स्वतंत्रता, प्रशासनिक पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों के प्रति उतनी ही गंभीरता दिखानी होगी। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों के लिए संविधान एक समान मर्यादा तय करता है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राजस्थान सरकार विकास, सुशासन और जनभागीदारी के अपने दावों को धरातल पर परिणामों से साबित करें,यही जनता की अपेक्षा है। राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत कटुता और संस्थाओं के प्रति अविश्वास में बदलने के बजाय नीति, प्रदर्शन और जनहित के मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए।रामलीला मैदान से त्रिपोलिया गेट तक निकली पदयात्रा का वास्तविक संदेश भी यही होना चाहिए कि लोकतंत्र किसी एक दल की जागीर नहीं है। कांग्रेस को यदि चुनावी प्रक्रिया पर सवाल हैं तो प्रमाण प्रस्तुत करने होंगे,भाजपा को यदि लोकतंत्र की रक्षा का दावा है तो पारदर्शिता और जवाबदेही का उदाहरण देना होगा। जनता को केवल भाषण नहीं, निष्पक्ष व्यवस्था चाहिए।आखिरकार लोकतंत्र की सबसे बड़ी अदालत जनता है। वह नारों से प्रभावित हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला काम, विश्वसनीयता और आचरण के आधार पर ही करती है। विपक्ष को यह समझना होगा कि जनादेश का सम्मान लोकतंत्र की पहली शर्त है और सत्ता पक्ष को यह याद रखना होगा कि जनादेश जनता की ओर से दी गई जिम्मेदारी है, मनमानी का अधिकार नहीं।





अश्विनी वैष्णव का सवाल—बहस संसद में हो, भ्रम के मंचों पर नहीं
