सल्लेखना मृत्यु नहीं, महा महोत्सव है : मुनि श्री योगसागर जी महाराज
समाधि मरण में शरीर को नहीं, कषायों को कृश करना ही सल्लेखना का उद्देश्य है; रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक 128-129 पर दिए प्रवचन
कोटा, 5 नवंबर (गुरुवार)। श्री दिगंबर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में चल रहे मंगल चातुर्मास के अंतर्गत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 128 एवं 129 पर प्रवचन करते हुए सल्लेखना (संथारा) की आध्यात्मिक महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मुनिश्री ने कहा कि सल्लेखना मृत्यु को आमंत्रित करना नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम समय को आत्मकल्याण का महोत्सव बनाने की अनुपम साधना है। इसमें राग-द्वेष, मोह और कषायों को क्रमशः क्षीण करते हुए आत्मा की निर्मलता की ओर अग्रसर हुआ जाता है। जब शरीर जीवन के अंतिम चरण में पहुंचता है, तब विषय-वासनाओं और सांसारिक आसक्तियों का त्याग कर आत्मस्वरूप में स्थिर होना ही सल्लेखना का वास्तविक उद्देश्य है।
उन्होंने कहा कि समाधि मरण में बाहरी शरीर को कष्ट देना लक्ष्य नहीं होता, बल्कि कषायों को कृश करना अर्थात् क्रोध, मान, माया और लोभ को धीरे-धीरे क्षीण करना प्रमुख होता है। आहार आदि का क्रमशः संयमपूर्वक परिमाण कम करते हुए मन को धर्म, स्वाध्याय, ध्यान और आत्मचिंतन में लगाना चाहिए।
मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि सल्लेखना समता, वैराग्य और आत्मजागरण की साधना है। जीवन के अंतिम क्षणों में भी किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति के प्रति राग-द्वेष नहीं रखते हुए शांत एवं समभावपूर्वक आत्मा का चिंतन करना ही इसकी सार्थकता है।
उन्होंने श्रावकों को प्रेरणा देते हुए कहा कि सल्लेखना केवल जीवन के अंतिम समय की साधना नहीं है, बल्कि यह प्रतिदिन आसक्ति कम करने, परिग्रह घटाने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। यदि जीवनभर संयम, त्याग और समता का अभ्यास किया जाए तो जीवन का अंतिम समय भी धर्ममय एवं शांत बन सकता है।
मुनिश्री के मंगल प्रवचन से धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने सल्लेखना के वास्तविक स्वरूप को समझते हुए आत्मचिंतन, संयम और वैराग्य को जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्राप्त की।
आज के प्रमुख पुण्यार्जक
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।
प्रशासनिक मंत्री अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ निर्मल कुमार, आशीष एवं अर्पित सबदरा परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ राकेश-शालिनी एवं जागृति महिला मंडल परिवार ने प्राप्त किया।
सुमित सेंकी एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; अनिल, पियूष एवं निशांत ठोरा परिवार; संतोष, देवकी रानी एवं आशीष हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने प्राप्त किया।
भक्तामर विधान में पुण्योदय मंडल ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।
सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ श्रीमान छोटूलाल जी ने प्राप्त किया। वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य चंद प्रकाश एवं भुवनेश जी धनोप्या परिवार को प्राप्त हुआ।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए तथा जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
गुरुवाणी का अमृत संदेश
“सल्लेखना शरीर छोड़ने की नहीं, कषायों को छोड़ने की साधना है।”
आज के प्रवचन का सार
राग-द्वेष और मोह का त्याग ही सच्ची आत्मसाधना है।
क्रोध, मान, माया और लोभ को क्षीण करना सल्लेखना का मूल उद्देश्य है।
जीवनभर संयम और समता का अभ्यास ही शांत समाधि मरण की प्रेरणा देता है।
स्वास्थ्य संदेश
शरीर की अनित्यता को समझें, उसकी उचित देखभाल करें और स्वस्थ जीवन के साथ संयमित दिनचर्या अपनाएं।
धर्मसाधना का संदेश
प्रतिदिन परिग्रह कम करें, कषायों पर नियंत्रण रखें और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन को धर्ममय बनाएं।







