Friday, October 30, 2026
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मोदी के नेतृत्व में भारत की संसदीय कूटनीति को नई धार, ओम बिरला के मंच पर साझा सहमति का वैश्विक संदेश

मोदी के नेतृत्व में भारत की संसदीय कूटनीति को नई धार, ओम बिरला के मंच पर साझा सहमति का वैश्विक संदेश

हाड़ौती का सपूत, वैश्विक लोकतंत्र का प्रहरी! ओम बिरला की मेजबानी में ब्रिक्स की ऐतिहासिक सहमति

 ‘ब्रिक्स की संयुक्त घोषणा से दुनिया को सहयोग का संदेश, हाड़ौती के लिए गौरव का क्षण

12वें ब्रिक्स संसदीय मंच की संयुक्त घोषणा: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक रुख और जन-केंद्रित विकास पर देशों की प्रतिबद्धता’

✍️ डॉ. नयन प्रकाश गांधी

पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक

नई दिल्ली में 26 और 27 अक्टूबर 2026 को आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का संयुक्त घोषणा के साथ संपन्न होना केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की औपचारिक परिणति नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में संवाद, सहयोग और साझा जिम्मेदारी की आवश्यकता का महत्वपूर्ण संकेत है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस मंच पर सदस्य देशों की संसदों के पीठासीन अधिकारियों और प्रतिनिधियों ने जिन मुद्दों पर सहमति व्यक्त की, वे वैश्विक शांति, आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व, तकनीकी परिवर्तन और आम नागरिकों के जीवन से सीधे जुड़े हैं। इस दृष्टि से संयुक्त घोषणा को भारत की संसदीय कूटनीति और वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं के संदर्भ में देखना आवश्यक है।

भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) की 27 अक्टूबर 2026 की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा उद्घाटित यह मंच संयुक्त घोषणा को सर्वसम्मति से अपनाने के साथ संपन्न हुआ। घोषणा में संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों, संप्रभु समानता, पारस्परिक सम्मान, आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने और अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई गई। साथ ही, वैश्विक शासन व्यवस्था में विकासशील देशों की अधिक प्रभावी भागीदारी और आतंकवाद के विरुद्ध ठोस कार्रवाई पर बल दिया गया।

संयुक्त घोषणा में सहमति का वास्तविक महत्व

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अलग-अलग देशों के हित, सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और आर्थिक प्राथमिकताएँ हमेशा समान नहीं होतीं। ऐसे परिवेश में विभिन्न देशों की संसदों का किसी साझा घोषणा पर सहमत होना इस बात का संकेत है कि मतभेदों के बावजूद संवाद के लिए संस्थागत मंच बनाए जा सकते हैं।

ब्रिक्स संसदीय मंच का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि संसदें केवल कानून बनाने वाली संस्थाएँ नहीं हैं। वे जनता की आकांक्षाओं, सामाजिक समस्याओं और लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रतिनिधित्व करती हैं। संसदों के बीच संवाद से सरकारों की नीतियों को व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण मिल सकता है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए राजनीतिक तथा लोकतांत्रिक आधार मजबूत हो सकता है।

हालाँकि, संयुक्त घोषणा पर सहमति को सभी देशों के बीच प्रत्येक मुद्दे पर पूर्ण एकरूपता का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। इसका महत्व साझा सिद्धांतों और प्राथमिकताओं पर बनी सहमति में है। वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि ये प्रतिबद्धताएँ आगे चलकर कानूनों, संसदीय पहलों, नीतिगत सहयोग और नागरिकों के जीवन में कितनी दिखाई देती हैं।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार: वैश्विक दक्षिण की आवाज का प्रश्न

संयुक्त घोषणा का एक प्रमुख पक्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में वैश्विक दक्षिण के देशों की अधिक प्रभावी भागीदारी का समर्थन है। भारत लंबे समय से यह तर्क रखता आया है कि वर्तमान वैश्विक संस्थागत संरचनाओं में आज की जनसंख्या, आर्थिक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं का पर्याप्त प्रतिबिंब होना चाहिए।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विकसित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अनेक ऐसे देश हैं जिनकी जनसंख्या, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका में व्यापक परिवर्तन हुआ है। इसके बावजूद वैश्विक निर्णय लेने वाली प्रमुख संस्थाओं की संरचना में अपेक्षित परिवर्तन नहीं हो पाया है। ऐसे में सुरक्षा परिषद के सुधार का मुद्दा केवल भारत की आकांक्षा नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व, वैधता और वैश्विक लोकतांत्रिक संतुलन से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

संयुक्त घोषणा में इस सुधार के समर्थन का अर्थ है कि संसदीय प्रतिनिधियों ने इस विषय को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्वपूर्ण एजेंडे के रूप में स्वीकार किया। इससे भारत को अपनी दीर्घकालिक मांग के पक्ष में राजनीतिक संवाद आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है।

फिर भी यह समझना जरूरी है कि संसदीय मंच पर समर्थन मिलना और सुरक्षा परिषद की संरचना में वास्तविक परिवर्तन होना दो अलग-अलग चरण हैं। वास्तविक सुधार के लिए संयुक्त राष्ट्र की निर्धारित प्रक्रियाओं, सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति और आवश्यक संस्थागत अनुमोदन की जरूरत होगी। इसलिए इस घोषणा को अंतिम उपलब्धि के बजाय सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम के रूप में देखना अधिक उचित है।

आतंकवाद पर स्पष्ट रुख: सुरक्षा के प्रश्न पर दोहरे मानदंड स्वीकार्य नहीं

संयुक्त घोषणा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सीमा-पार आतंकवाद, आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकवादियों को सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने की निंदा है। इसमें आतंकवाद के विरुद्ध शून्य सहनशीलता और दोहरे मानदंड समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

भारत के लिए यह विषय केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिकों के जीवन और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा प्रश्न है। आतंकवाद किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। इसके वित्तीय नेटवर्क, तकनीकी साधन, प्रचार तंत्र और सीमा-पार संपर्क अनेक देशों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इसका मुकाबला केवल अलग-अलग राष्ट्रीय प्रयासों से नहीं, बल्कि सूचनाओं के आदान-प्रदान, वित्तीय निगरानी, कानूनी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से भी जुड़ा है।

आतंकवाद के विरुद्ध प्रभावी वैश्विक व्यवस्था के लिए यह जरूरी है कि किसी भी संगठन या व्यक्ति के मामले में निर्णय का आधार विश्वसनीय प्रमाण, लागू कानून और समान मानदंड हों। आतंकवाद के प्रश्न पर राजनीतिक सुविधा के अनुसार अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाने से अंतरराष्ट्रीय सहयोग कमजोर होता है।

संयुक्त घोषणा में व्यक्त प्रतिबद्धता का व्यावहारिक महत्व तभी बढ़ेगा, जब संबंधित देश आतंकवाद के वित्तीय स्रोतों को रोकने, आतंकवादी नेटवर्क के विरुद्ध सहयोग बढ़ाने और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने वालों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाएँगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और भारत की वैश्विक भूमिका

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान संसदीय सहयोग को वैश्विक संवाद के व्यापक ढाँचे से जोड़ना भारतीय कूटनीति के लिए महत्वपूर्ण अवसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की विदेश नीति ने विकासशील देशों की प्राथमिकताओं, तकनीकी सहयोग, आर्थिक साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे विषयों को प्रमुखता दी है।

सितंबर 2026 में भारत में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद नई दिल्ली में आयोजित संसदीय मंच ने इस संवाद को विधायी और लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्तर पर आगे बढ़ाने का अवसर दिया। जहाँ शिखर सम्मेलन में सरकारों के प्रमुख व्यापक नीतिगत दिशा पर चर्चा करते हैं, वहीं संसदीय मंच इन प्राथमिकताओं को कानून, जवाबदेही और नागरिक हितों से जोड़ने में सहायक हो सकता है।

भारत की कूटनीतिक सफलता का मूल्यांकन केवल सम्मेलनों की संख्या या जारी घोषणाओं से नहीं किया जाना चाहिए। असली कसौटी यह है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए अन्य देशों के साथ कितनी प्रभावी साझेदारी बनाता है, वैश्विक समस्याओं के समाधान में कितना योगदान देता है और विकासशील देशों की आवाज को कितना मजबूत कर पाता है।

इस संदर्भ में संयुक्त घोषणा भारत की अध्यक्षता के दौरान बनी सहमति का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसके माध्यम से भारत ने संवाद, बहुपक्षीय सहयोग और जन-केंद्रित विकास को एक साझा एजेंडे के रूप में आगे बढ़ाने का अवसर प्राप्त किया है।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका: संसदीय संवाद से सहमति निर्माण तक

12वें ब्रिक्स संसदीय मंच में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका को संसदीय कूटनीति के व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। संसद के पीठासीन अधिकारी का दायित्व केवल सदन की कार्यवाही का संचालन करना नहीं है; अंतरराष्ट्रीय संसदीय मंचों पर वे लोकतांत्रिक संवाद, संस्थागत सहयोग और प्रतिनिधित्व की परंपराओं को भी सामने रखते हैं।

नई दिल्ली में आयोजित इस मंच का विषय था—“जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को सशक्त बनाना”। यह विषय इस विचार को रेखांकित करता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की सफलता केवल उनकी औपचारिक संरचना से नहीं, बल्कि नागरिकों की समस्याओं के समाधान, पारदर्शिता और जवाबदेही से मापी जानी चाहिए।

ओम बिरला ने मंच के समापन अवसर पर इस विचार पर बल दिया कि वैश्विक चुनौतियों के स्थायी समाधान संघर्ष के बजाय संवाद, युद्ध के बजाय शांति और प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग से खोजे जाने चाहिए। संसदीय कूटनीति का यही मूल उद्देश्य है—ऐसे संवाद के रास्ते खुले रखना, जिनके माध्यम से देशों के प्रतिनिधि मतभेदों के बीच साझा हितों की पहचान कर सकें।

कोटा-बूंदी सहित पूरे हाड़ौती क्षेत्र के लिए यह गौरव का विषय है कि क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद ओम बिरला लोकसभा अध्यक्ष के रूप में इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय संसदीय संवाद की मेजबानी कर रहे हैं। लेकिन किसी जनप्रतिनिधि की अंतरराष्ट्रीय भूमिका का वास्तविक मूल्यांकन केवल पद या आयोजन की प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, जनता के प्रति जवाबदेही बढ़ाने और सहयोग के ठोस परिणाम सामने लाने से होना चाहिए।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक: संसदों के सामने नई चुनौती

संयुक्त घोषणा का एक और महत्वपूर्ण आयाम जिम्मेदार तकनीकी उपयोग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के माध्यम से संसदीय संस्थाओं की कार्यक्षमता बढ़ाने से जुड़ा है। डिजिटल परिवर्तन के इस दौर में संसदों के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी।

एआई की सहायता से विधायी दस्तावेजों का विश्लेषण, विभिन्न भाषाओं में संसदीय सामग्री की उपलब्धता, जनप्रतिनिधियों तक सूचनाओं की पहुँच और नागरिकों की शिकायतों के वर्गीकरण जैसी प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे सांसदों और संसदीय समितियों को जटिल विषयों पर विचार करने के लिए बेहतर सूचना-सहायता मिल सकती है।

लेकिन तकनीक को लोकतांत्रिक जवाबदेही का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। गलत सूचना, पक्षपातपूर्ण एल्गोरिदम, निजी आँकड़ों की सुरक्षा, साइबर हमले और निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे प्रश्नों का समाधान भी आवश्यक है। इसलिए एआई का उपयोग मानवीय निगरानी, स्पष्ट नियमों, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और जवाबदेही के साथ होना चाहिए।

यदि ब्रिक्स देश इस क्षेत्र में अनुभव और सर्वोत्तम प्रक्रियाओं का आदान-प्रदान करते हैं, तो संसदीय संस्थाएँ अधिक सुलभ, पारदर्शी और प्रभावी बन सकती हैं। यह सहयोग विशेष रूप से उन देशों के लिए उपयोगी होगा जहाँ भाषाई विविधता और संसाधनों की सीमाएँ विधायी सूचना तक समान पहुँच को प्रभावित करती हैं।

जन-केंद्रित विकास: घोषणा से नागरिकों तक लाभ पहुँचाने की चुनौती

किसी भी अंतरराष्ट्रीय घोषणा की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी आम नागरिक का जीवन है। विकास का अर्थ केवल आर्थिक वृद्धि या बड़े निवेश तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सशक्तीकरण, युवाओं के अवसर, पर्यावरण संरक्षण और डिजिटल सेवाओं तक समान पहुँच भी विकास के आवश्यक आयाम हैं।

ब्रिक्स देशों के बीच अनुभव साझा करने से सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने, सामाजिक असमानताओं को कम करने और विकास की योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने के अवसर मिल सकते हैं। संसदें इन प्रयासों में कानून निर्माण, बजट की समीक्षा, नीतिगत निगरानी और सरकारों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

इसके लिए आवश्यक होगा कि संसदीय संवाद केवल उच्चस्तरीय बैठकों तक सीमित न रहे। संसदीय समितियों के बीच नियमित सहयोग, शोध संस्थानों के साथ संवाद, युवाओं और महिलाओं की भागीदारी तथा नीतियों के परिणामों की समीक्षा जैसे उपाय संयुक्त घोषणा को व्यावहारिक दिशा दे सकते हैं।

भारत के लिए भी यह अवसर है कि वह डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, वित्तीय समावेशन, सामाजिक कल्याण और नागरिक सेवाओं के अपने अनुभव साझा करे तथा अन्य देशों की उपयोगी नीतियों से सीखने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाए।

चीन को अध्यक्षता सौंपना और सहयोग की निरंतरता

27 अक्टूबर को मंच के समापन के साथ ब्रिक्स संसदीय मंच की अध्यक्षता चीन को सौंपना संस्थागत निरंतरता का महत्वपूर्ण संकेत था। भारत की अध्यक्षता में आयोजित बैठक के बाद अगले चरण में सहयोग आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी चीन के पास होगी।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अध्यक्षता का हस्तांतरण केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं होता। यह इस बात की परीक्षा भी है कि अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक हित रखने वाले देश साझा एजेंडे को किस तरह निरंतरता प्रदान करते हैं। भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों हैं—एक ओर अपनी अध्यक्षता के दौरान बनी सहमति को आगे बढ़ाने में योगदान देना, दूसरी ओर अगले अध्यक्ष देश के साथ सहयोग के व्यावहारिक रास्ते खुले रखना।

ब्रिक्स के भीतर मतभेदों के बावजूद साझा मुद्दों पर काम करना बहुपक्षीय व्यवस्था की उपयोगिता को मजबूत कर सकता है। संसदीय स्तर पर निरंतर संवाद इस दिशा में सहायक हो सकता है, बशर्ते सदस्य देश अपनी घोषणाओं को संस्थागत सहयोग और ठोस कार्ययोजनाओं से जोड़ें।

आगे की राह: संयुक्त घोषणा को कार्ययोजना में बदलना होगा

12वें ब्रिक्स संसदीय मंच की संयुक्त घोषणा ने कई महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं पर साझा सहमति को सामने रखा है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इन प्रतिबद्धताओं को समयबद्ध कार्ययोजनाओं, नियमित समीक्षा और मापने योग्य परिणामों से जोड़ा जाए।संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय संवाद, आतंकवाद के विरुद्ध वास्तविक सहयोग, डिजिटल तकनीक के जिम्मेदार उपयोग और जन-केंद्रित विकास के लिए संसदीय संस्थाओं की क्षमता बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में निरंतर प्रयास आवश्यक होंगे। सदस्य देशों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी राष्ट्रीय नीतियाँ घोषित अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के अनुरूप आगे बढ़ें।एक सार्वजनिक नीति विश्लेषक के रूप में मेरा मानना है कि इस घोषणा के प्रभाव का मूल्यांकन तीन आधारों पर किया जाना चाहिए—पहला, साझा प्रतिबद्धताओं पर देशों की वास्तविक प्रगति; दूसरा, संसदीय संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार; और तीसरा, नागरिकों के जीवन में दिखाई देने वाले सकारात्मक परिणाम। इस तरह का मूल्यांकन अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों को औपचारिक उपलब्धि से आगे बढ़ाकर नीति निर्माण की प्रभावी प्रक्रिया बना सकता है।भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में बनी यह सहमति संवाद और सहयोग के महत्व को रेखांकित करती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक भूमिका और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के माध्यम से सामने आया संसदीय संवाद तभी दीर्घकालिक महत्व प्राप्त करेगा, जब इसके सिद्धांत व्यवहार में उतरेंगे।अंततः, संयुक्त घोषणा का संदेश स्पष्ट है,वैश्विक समस्याओं का समाधान अलगाव से नहीं, सहयोग से; अविश्वास से नहीं, संवाद से; और केवल सत्ता-केंद्रित निर्णयों से नहीं, बल्कि नागरिकों की आकांक्षाओं को केंद्र में रखकर ही संभव है। यही जन-केंद्रित लोकतंत्र की कसौटी है और यही ब्रिक्स संसदीय सहयोग की सबसे बड़ी संभावित उपलब्धि भी।

✍️डॉ. नयन प्रकाश गांधी -पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक

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