नवरात्रि का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित, तपस्या और साधना से मिलता है संयम व सदाचार का संदेश
कोटा शैली और हाड़ौती कलम में देसी रंगों, असली सोने के वर्क और हिलकारी से सजी मां ब्रह्मचारिणी की हस्तनिर्मित बसली पेंटिंग बनी आकर्षण का केंद्र
कोटा। शारदीय नवरात्रि का दूसरा दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना, तपस्या और साधना को समर्पित है। मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप भक्तों को त्याग, तप, संयम, वैराग्य और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां की आराधना करने से साधक को आत्मबल, धैर्य और जीवन में कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।
भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की कठोर तपस्या
मां ब्रह्मचारिणी पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवर्षि नारद के मार्गदर्शन में उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी इसी तपस्या और साधना के कारण उन्हें मां ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना जाता है।
‘ब्रह्मचारिणी’ शब्द का भाव तपस्या, साधना और अनुशासित आचरण से जुड़ा है। मां को तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा जैसे नामों से भी जाना जाता है। उनका स्वरूप साधकों को लक्ष्य प्राप्ति के लिए धैर्य, दृढ़ संकल्प और आत्मसंयम बनाए रखने का संदेश देता है।
हाथों में रुद्राक्ष की माला और कमंडल
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और तपस्विनी का है। उनके एक हाथ में रुद्राक्ष की माला तथा दूसरे हाथ में कमंडल सुशोभित रहता है। रुद्राक्ष की माला निरंतर जप और साधना का प्रतीक है, जबकि कमंडल तपस्वी जीवन, सादगी और संयम का संदेश देता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन श्रद्धालु मां ब्रह्मचारिणी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक परंपराओं में मां को शक्कर या मिश्री का भोग अर्पित करने की मान्यता है। भक्त मां से सुख-समृद्धि, मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन में सकारात्मकता की प्रार्थना करते हैं।
कोटा शैली और हाड़ौती कलम में साकार हुआ मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप
मां ब्रह्मचारिणी की धार्मिक महिमा के साथ-साथ उनकी पारंपरिक चित्रकला में प्रस्तुति भी भारतीय कला और संस्कृति की समृद्ध विरासत को दर्शाती है। कोटा शैली और हाड़ौती कलम में तैयार की गई मां ब्रह्मचारिणी की हस्तनिर्मित बसली पेंटिंग में पारंपरिक कलात्मकता और आध्यात्मिक भावों का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
इस पेंटिंग को तैयार करने में देसी रंगों, असली सोने के वर्क और हिलकारी यानी लिक्विड गोल्ड का उपयोग किया गया है। हस्तनिर्मित बसली पर उकेरा गया मां का स्वरूप पारंपरिक चित्रांकन की बारीकियों, रंगों की गहराई और धार्मिक आस्था को अभिव्यक्त करता है।
कोटा शैली और हाड़ौती कलम की ऐसी कलाकृतियां न केवल देवी-देवताओं के स्वरूप को जीवंत करती हैं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक चित्रकला को भी आगे बढ़ाती हैं।
तप, त्याग और आत्मसंयम की प्रेरणा
मां ब्रह्मचारिणी की आराधना का मूल संदेश है कि कठिन से कठिन लक्ष्य भी धैर्य, दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास से प्राप्त किए जा सकते हैं। उनकी साधना भक्तों को जीवन में अनुशासन अपनाने, सदाचार के मार्ग पर चलने और विपरीत परिस्थितियों में भी अपने संकल्प पर अडिग रहने की प्रेरणा देती है।
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना के साथ श्रद्धालु भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि का संकल्प लेते हैं। मां का तपस्विनी स्वरूप जीवन में सादगी, समर्पण और सकारात्मक विचारों का महत्व समझाता है।






