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कच्छ की राजकुमारी से मेवाड़ की राजमाता तक का सफर, 83 वर्ष की आयु में विजयराज कुमारी का निधन

कच्छ की राजकुमारी से मेवाड़ की राजमाता तक का सफर, 83 वर्ष की आयु में विजयराज कुमारी का निधन

उदयपुर। मेवाड़ के पूर्व राजपरिवार की राजमाता विजयराज कुमारी का 14 सितंबर 2026 की देर रात 83 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहीं राजमाता के निधन की खबर से उदयपुर सहित मेवाड़ अंचल में शोक की लहर दौड़ गई। उन्होंने अपना जीवन शिक्षा, समाज सेवा, महिला सशक्तिकरण और मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े कार्यों को समर्पित किया।

कच्छ राजपरिवार में हुआ जन्म

विजयराज कुमारी का जन्म 21 दिसंबर 1942 को गुजरात के कच्छ राजपरिवार में हुआ था। वे कच्छ के महाराज फतह सिंह की पुत्री थीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ऊटी के फ्रांसिस्कन कॉन्वेंट स्कूल में हुई। राजसी परिवेश में पली-बढ़ीं विजयराज कुमारी ने शिक्षा और आधुनिक दृष्टिकोण के साथ सामाजिक सरोकारों को भी अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

अरविंद सिंह मेवाड़ से विवाह के बाद बनीं मेवाड़ की राजमाता

विजयराज कुमारी का विवाह मेवाड़ राजपरिवार के सदस्य अरविंद सिंह मेवाड़ से हुआ। विवाह के बाद वे उदयपुर आईं और मेवाड़ की परंपराओं, संस्कृति तथा सामाजिक दायित्वों से गहराई से जुड़ गईं। अरविंद सिंह मेवाड़ का 16 मार्च 2025 को निधन हुआ था। विजयराज कुमारी उनके परिवार की महत्वपूर्ण स्तंभ मानी जाती थीं।

उनके परिवार में पुत्र डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ तथा पुत्रियां भार्गवी कुमारी और पद्मजा कुमारी परमार शामिल हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में अहम योगदान

राजमाता विजयराज कुमारी का शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान रहा। उदयपुर के महाराणा मेवाड़ पब्लिक स्कूल के विकास और आधुनिक शैक्षणिक व्यवस्था को मजबूत करने में 1980 के दशक में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। शिक्षा को समाज के विकास का आधार मानते हुए उन्होंने विद्यार्थियों और नई पीढ़ी के लिए बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार करने पर जोर दिया।

महिला सशक्तिकरण और समाज सेवा को दिया महत्व

राजमाता विजयराज कुमारी केवल राजपरिवार की परंपराओं तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने महिला सशक्तिकरण, बाल विकास और सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रुचि दिखाई। मेवाड़ की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति भी उनका विशेष लगाव रहा।

उनका व्यक्तित्व राजसी गरिमा के साथ सामाजिक सरोकारों का उदाहरण रहा। शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके योगदान को लंबे समय तक याद किया जाएगा।

शाही परंपरा के साथ दी गई अंतिम विदाई

15 सितंबर  की सुबह उदयपुर सिटी पैलेस से राजमाता विजयराज कुमारी की अंतिम यात्रा निकाली गई। शाही परंपरा और गार्ड ऑफ ऑनर के साथ उनकी पार्थिव देह को मेवाड़ राजपरिवार के ऐतिहासिक श्मशान स्थल महासतियाजी ले जाया गया, जहां विधि-विधान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में आमजन और गणमान्य लोग मौजूद रहे।

कच्छ की राजकुमारी के रूप में जन्म लेकर मेवाड़ की राजमाता बनने तक का विजयराज कुमारी का सफर राजसी वैभव से अधिक सेवा, संस्कार और सामाजिक सरोकारों के लिए याद किया जाएगा।

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