गारंटी
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जीवन की जब न गारंटी,
फिर किस बात की गारंटी ।
मात्र फ़ैकुओं का कलाम,
जो बना नाम है गारंटी ।।
इंसानियत कहीँ ज़िंदा हो,
उसूल अगर कहीँ जिंदा हो ।
जुबान लकीर है पत्थर की,
क्यों भला शर्मिंदा हो ।।
साफ कहो और सुखी रहो,
व्यर्थ में क्यों दुःखी रहो ।
रब पर विश्वास रखो रे,
सर्वदा अन्तर्मुखी रहो ।।
उसी पर ही रखो भरोसा,
नाम बना जो गारंटी ।
जीवन की जब न गारंटी,
फिर किस बात की गारंटी ।।
# स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित
# बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”,
कोटा (राजस्थान)






