Monday, April 20, 2026
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यह घर अब घर ना रहा मकान हो गया- कृष्ण ‘राम’ पंकज

ये घर अब घर न रहा मकान हो गया है,

हर रोज की किचकिच,झगड़े,चिल्लाना वो रोना

ये गुलिस्तां किस की नजर से शमशान हो गया है,

कभी खुशियों का आलम था मुस्काने चहकती थी

जहां कभी हवाओं में रिश्तों की खुशबू महकती थी

क्या हुआ के फिजाएं बदल सी गई लगता है

आबाद-ओ-चमन, आँगन-ए-सब्र अब वीरान हो गया है,

ये घर अब घर न रहा मकान हो गया है,

पूरे दिन की थकान दूर करने वाली उसकी मुस्कान

ना जाने क्यूँ अब सिसकियों में तब्दील सी मिलती है

वो कहना उनका के शाम को जल्दी आ जाना घर

ये कोरी बातें अब सीने में गढ़ी कील सी लगती है

क्या गिला करूँ उनसे के जिंदगी का काफिला सुनसान हो गया है,

ये घर अब घर न रहा मकान हो गया है,

 

कृष्ण’राम”पंकज

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