1947 में कोटा के घंटाघर पर मनाया गया था आजादी का पर्व
कोटा का ऐतिहासिक घंटाघर…
पुराने कोटा की पहचान बना यह घंटाघर सिर्फ समय बताने वाली एक ऐतिहासिक इमारत नहीं है, बल्कि शहर के इतिहास के कई महत्वपूर्ण दौरों का गवाह भी रहा है।
यह लंबी इमारत कोटा के उसी पुराने शहर में, जहां घंटाघर के आसपास आज भी मोची कटला जैसे ऐतिहासिक बाजार क्षेत्र मौजूद हैं।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के विरासत दस्तावेज में कोटा के घंटाघर को पुरानी सब्जी मंडी क्षेत्र में स्थित बहुमंजिला ऐतिहासिक इमारत के रूप में दर्ज किया गया है। इसके स्थापत्य में गुंबदाकार छतरी और नुकीले मेहराब दिखाई देते हैं। दस्तावेज में इसकी निर्माण तकनीक को इंडो-फारसी शैली से संबंधित बताया गया है।
लेकिन इस घंटाघर की कहानी इससे भी ज्यादा दिलचस्प है।
इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज यानी INTACH के विरासत रिकॉर्ड के अनुसार, कोटा का यह क्लॉक टावर 1893 में महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के समय बनाया गया था। INTACH के अनुसार इसे तत्कालीन ब्रिटिश राजनीतिक एजेंट चार्ल्स एलन बेले की स्मृति से जोड़ा जाता है और टावर की घड़ियां इंग्लैंड से लाई गई थीं। इसकी वास्तुकला में राजस्थानी शैली का प्रभाव दिखाई देता है और ऊपर छतरी बनाई गई है।
यानी आज से करीब सवा सौ साल पहले बना यह घंटाघर उस समय के कोटा में आधुनिक सार्वजनिक जीवन और समय की व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण प्रतीक रहा होगा।
घंटाघर का इतिहास – जिससे इस जगह का रिश्ता देश की आजादी से जुड़ता है।
साल था 1947 जब देश ब्रिटिश शासन से आजादी की ओर बढ़ चुका था। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ और देशभर में आजादी का उत्सव मनाया गया।
कोटा में भी आजादी की खुशी का यह दौर लोगों की स्मृतियों में दर्ज रहा। स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, घंटाघर क्षेत्र में आजादी का पर्व मनाया गया था।
उस समय पुराना कोटा शहर व्यापारिक और सामाजिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। घंटाघर के आसपास के बाजारों में बड़ी संख्या में लोग आते-जाते थे। इसी क्षेत्र में मोची कटला भी स्थित है, जिसका नाम आज भी घंटाघर क्षेत्र की पहचान से जुड़ा हुआ है। राजस्थान पुलिस के वर्तमान रिकॉर्ड में भी मोची कटला को घंटाघर, थाना मकबरा क्षेत्र के पते के रूप में दर्ज किया गया है।
और इसी ऐतिहासिक क्षेत्र में शहीद स्मारक भी वीर शहीदों की स्मृति और उनके बलिदान की कहानी को सामने रखता है।
आजादी हमें आसानी से नहीं मिली
अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने संघर्ष किया, जेलें झेलीं और देश के लिए अपना जीवन समर्पित किया। इसलिए शहीद स्मारक जैसे स्थल केवल पत्थर और निर्माण नहीं होते—ये आने वाली पीढ़ियों को देश के लिए दिए गए बलिदान की याद दिलाते हैं।
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर इस क्षेत्र में शहीदों को याद करने और राष्ट्र के प्रति सम्मान व्यक्त करने की परंपरा आज भी दिखाई देती है।
यही इस स्थान की सबसे बड़ी खासियत है—
इतिहास का साक्षी घंटाघर…
दूसरी तरफ पुराने बाजारों की पहचान—मोची कटला और इसी ऐतिहासिक परिवेश में शहीदों की स्मृति को समर्पित स्मारक।
तीनों मिलकर कोटा के उस इतिहास की तस्वीर सामने रखते हैं, जिसमें रियासत का दौर, बदलता हुआ शहर, आजादी का संघर्ष और स्वतंत्र भारत की स्मृतियां एक साथ दिखाई देती हैं।
आज जब हम 15 अगस्त को तिरंगा फहराते हैं, तो कोटा का यह ऐतिहासिक घंटाघर हमें उस दौर की याद दिलाता है, जब आजादी एक सपना नहीं बल्कि संघर्ष से हासिल की गई हकीकत बनी थी।
घंटाघर की घड़ी की सुइयां आगे बढ़ती रहीं...
समय बदलता गया…
रियासत बदली…
देश आजाद हुआ…
और कोटा भी आधुनिक शहर की ओर बढ़ता गया।
लेकिन पुराना घंटाघर आज भी खड़ा है—
अपने भीतर इतिहास की कई परतें समेटे हुए।
1893 का घंटाघर…
1947 की आजादी की स्मृतियां…
मोची कटला की पुरानी पहचान…
और शहीदों की याद में बना स्मारक…
ये सब मिलकर कोटा की विरासत का एक ऐसा अध्याय बनाते हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है।
यह सिर्फ एक घंटाघर नहीं…
यह कोटा के बदलते समय का साक्षी है।
जय हिंद!
वंदे मातरम्!
इतिहास संकलनकर्ता : मयूर सोनी✍️
स्रोत एवं संदर्भ : उपलब्ध ऐतिहासिक एवं विरासत अभिलेख –
फोटो जो कलर में उपलब्ध कराया गया है-सबा फिल्मस से अशफाक अंसारी जी
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