अंगदान : जीवन का सबसे बड़ा महादान
एक संकल्प, जो मृत्यु के बाद भी आठ जिंदगियों में उम्मीद की नई रोशनी जगा सकता है।
“एक व्यक्ति के जाने से एक परिवार शोक में डूब जाता है, लेकिन एक अंगदाता आठ लोगों को नया जीवन देकर अनेक परिवारों में फिर से खुशियों का दीप जला सकता है।”
भारतीय संस्कृति में दान को सर्वोच्च पुण्य माना गया है। अन्नदान, विद्यादान, श्रमदान और रक्तदान जैसे अनेक दान समाज को समृद्ध बनाते हैं, किंतु अंगदान इन सबसे बढ़कर है। यह ऐसा महादान है, जो मृत्यु के बाद भी जीवन की ज्योति जलाए रखता है। किसी व्यक्ति का हृदय, किडनी, लिवर, फेफड़े, आँखें और अन्य अंग किसी ज़रूरतमंद को नया जीवन दे सकते हैं। इसलिए अंगदान केवल चिकित्सा का विषय नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और संवेदनशीलता का सर्वोच्च संदेश है।
यहाँ अंगदान और देहदान के बीच का अंतर समझना भी आवश्यक है। देहदान में पूरा पार्थिव शरीर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान के लिए मेडिकल कॉलेज को समर्पित किया जाता है, जिससे भावी चिकित्सकों को अध्ययन और शोध में सहायता मिलती है। वहीं अंगदान में प्रत्यारोपण योग्य अंगों को ज़रूरतमंद मरीजों को जीवनदान देने के लिए उपयोग में लाया जाता है। दोनों ही मानव सेवा के सर्वोच्च उदाहरण हैं और समाज के लिए समान रूप से प्रेरणादायक हैं।
प्रेरक उदाहरण : मृत्यु के बाद भी मानवता की अमर मिसाल
हाल ही में इन्हीं विषयों पर सुवि नेत्र चिकित्सालय के वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ डॉ. सुरेश के. पाण्डेय से चर्चा के दौरान उन्होंने एक अत्यंत प्रेरणादायक उदाहरण साझा किया। उन्होंने बताया कि 6 जुलाई 1933 को जन्मे डॉ. मोहन राज जैन ने अपने जीवनकाल में ही देहदान का संकल्प लिया था। उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप 93 वर्ष की आयु में उनके पार्थिव शरीर का देहदान किया गया। उनका यह निर्णय इस बात का जीवंत प्रमाण है कि सेवा और मानवता का भाव मृत्यु के बाद भी जीवित रह सकता है।
इसी प्रकार मई 2026 में कोटा विकास प्राधिकरण के भू-अभिलेख निरीक्षक हरीश प्रजापति ने भी अपने स्वर्गीय पिताश्री बजरंग लाल सत्यसखा की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनका पार्थिव शरीर राजकीय चिकित्सा महाविद्यालय, कोटा को देहदान के लिए समर्पित किया। यह देहदान चिकित्सा विद्यार्थियों के अध्ययन एवं अनुसंधान में उपयोगी सिद्ध होगा। ऐसे प्रेरक उदाहरण समाज में सेवा, संवेदना और मानवता की भावना को सुदृढ़ करते हैं तथा अंगदान और देहदान—दोनों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करते हैं।
हम जीवनभर यह सोचते रहते हैं कि समाज को क्या दे सकते हैं। धन, संपत्ति और वस्तुएँ सीमित लोगों की सहायता करती हैं, लेकिन अंगदान किसी व्यक्ति को नया जीवन देने का अवसर देता है। यही कारण है कि इसे “जीवन का सबसे बड़ा महादान” कहा जाता है।
अंगदान मुख्यतः दो प्रकार का होता है। पहला जीवित अंगदान, जिसमें कोई स्वस्थ व्यक्ति अपने जीवनकाल में एक किडनी, लिवर का एक भाग अथवा बोन मैरो अपने निकट संबंधी को दान कर सकता है। दूसरा मृतक अंगदान, जिसमें किसी व्यक्ति को चिकित्सकों द्वारा ब्रेन-स्टेम डेड घोषित किए जाने के बाद परिजनों की सहमति से उसके हृदय, फेफड़े, लिवर, किडनी, कॉर्निया, त्वचा तथा अन्य अंग ज़रूरतमंद मरीजों को प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं। एक मृतक दाता कई लोगों का जीवन बचाने के साथ-साथ अनेक अन्य लोगों के जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर बना सकता है।
भारत में पिछले कुछ वर्षों में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। प्रत्यारोपण की संख्या लगातार बढ़ रही है और जागरूकता भी पहले की तुलना में अधिक हुई है। फिर भी वास्तविक आवश्यकता की तुलना में अंगदान की संख्या अभी बहुत कम है। हर वर्ष लाखों मरीज किडनी, लिवर, हृदय और कॉर्निया की प्रतीक्षा करते हैं, लेकिन समय पर अंग उपलब्ध नहीं होने के कारण अनेक लोग जीवन की लड़ाई हार जाते हैं। यह स्थिति केवल व्यापक जन-जागरूकता और सामाजिक सहभागिता से ही बदली जा सकती है।
संतोष का विषय है कि राजस्थान में भी अंगदान के प्रति जागरूकता का वातावरण निरंतर विकसित हो रहा है। हाल ही में कोटा विकास प्राधिकरण के आयुक्त श्री अग्रवाल ने अंगदान जागरूकता अभियान के लिए संकल्प लेकर समाज के समक्ष प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसे अभियान यह विश्वास जगाते हैं कि जब सरकार, चिकित्सा जगत, सामाजिक संस्थाएँ और आमजन एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब हजारों लोगों के जीवन में नई आशा का संचार संभव हो जाता है।
अंगदान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा जानकारी का अभाव और कुछ प्रचलित भ्रांतियाँ हैं। अनेक लोग मानते हैं कि धर्म इसकी अनुमति नहीं देता, जबकि लगभग सभी प्रमुख धर्म अंगदान को मानव सेवा का श्रेष्ठ कार्य मानते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि अंगदान से शरीर विकृत हो जाता है, जबकि चिकित्सा विशेषज्ञ पूरे सम्मान और वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ अंग निकालते हैं तथा अंतिम संस्कार की सभी परंपराएँ सामान्य रूप से संपन्न होती हैं। कुछ लोग अधिक आयु को भी बाधा मानते हैं, जबकि अंगदान में आयु नहीं, अंगों की कार्यक्षमता महत्वपूर्ण होती है। इसी प्रकार यह भ्रम भी पूरी तरह निराधार है कि अंगदान की सहमति होने पर डॉक्टर मरीज को बचाने का पूरा प्रयास नहीं करेंगे। चिकित्सा का पहला और सर्वोच्च उद्देश्य सदैव मरीज का जीवन बचाना होता है।
अंगदान का संकल्प लेना अत्यंत सरल है। राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) की वेबसाइट पर कुछ ही मिनटों में ऑनलाइन पंजीकरण किया जा सकता है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि अपने इस निर्णय की जानकारी अपने परिवार को अवश्य दें, क्योंकि अंतिम सहमति परिवार की होती है।
जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल लंबा जीवन जीना नहीं, बल्कि अपने जीवन से दूसरों के जीवन में प्रकाश भरना है। यदि हमारे जाने के बाद हमारी आँखें किसी को संसार दिखा सकें, हमारा हृदय किसी और के सीने में धड़क सके और हमारे अंग किसी परिवार की उम्मीद बन सकें, तो इससे बड़ा पुण्य और कोई नहीं हो सकता।
इसी संदर्भ में वर्ष 1971 में प्रदर्शित प्रसिद्ध हिन्दी फिल्म ‘आनंद’ का एक कालजयी संवाद स्मरण हो आता है। फिल्म में अभिनेता राजेश खन्ना अपने मित्र ‘बाबू मोशाय’ (अमिताभ बच्चन) से कहते हैं—“ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं।”
इस संवाद का सार यही है कि जीवन की सार्थकता उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, संवेदनशीलता और समाज के प्रति योगदान में निहित है। अंगदान इसी विचार को वास्तविक अर्थों में साकार करता है। इससे हमारी अपनी आयु लंबी नहीं होती, लेकिन हमारे जीवन का अर्थ अवश्य बड़ा हो जाता है। हमारे जाने के बाद भी हमारे अंग किसी अन्य के शरीर में धड़कते, साँस लेते और दुनिया देखते रहते हैं। इससे बड़ा जीवन का विस्तार और क्या हो सकता है!
वास्तव में अंगदान हमारी ज़िन्दगी को लंबी नहीं बनाता, लेकिन उसे इतना बड़ा अवश्य बना देता है कि हमारे जाने के बाद भी हमारी धड़कनें, हमारी दृष्टि और हमारी साँसें किसी और के जीवन में जीवित रहती हैं। शायद ईश्वर ने हमें दो बार जीवन जीने की शक्ति नहीं दी, लेकिन अंगदान के माध्यम से किसी दूसरे को जीवन देने का अवसर अवश्य दिया है। यही जीवन का सबसे बड़ा विस्तार है और यही सच्चे अर्थों में महादान है।
आइए, आज ही संकल्प लें—अंगदान के प्रति जागरूक बनें, अपने परिवार को अपनी इच्छा से अवगत कराएँ और मानवता की इस महान सेवा के सहभागी बनें। क्योंकि जीवन का सबसे सुंदर उपहार, जीवन ही है।
— परमानन्द गोयल
कोटा (राजस्थान)





