गीता श्लोक 3/32
भगवान में दोष करने वालों का पतन हो जाता है ….
हे अर्जुन! परंतु जो मनुष्य मेरे इस मत में दोष दृष्टि करते हुए, इसका अनुष्ठान नहीं करते उन संपूर्ण ज्ञानों में मोहित और अविवेकी मनुष्यों को नष्ट हुए ही समझो अर्थात उनका पतन हो जाता है।
संसार में सभी स्वार्थी मनुष्य चाहते हैं कि हमें ही सब पदार्थ मिले, हमें ही लाभ प्राप्त हो, इसी प्रकार भगवान भी चाहते हैं की समस्त कर्मों को मेरे ही अर्पण किया जाए, मुझे ही स्वामी माना जाए, ऐसा मानना भगवान पर दोषा रोपण करना है।
जो मनुष्य भगवान के मत का अनुसरण नहीं करते, वह सब प्रकार से सांसारिक ज्ञानों में मोहित रहते हैं । मनुष्य का शरीर पाकर जो मनुष्य भगवान के मत का अनुसरण नहीं करते, उन मनुष्यों को नष्ट हुए ही समझना चाहिए । इसका अर्थ है कि वह जन्म मरण के चक्कर में पड़े रहेंगे। मनुष्य जीवन में अनंत काल तक मुक्ति की संभावना रहती है । अतः जो मनुष्य वर्तमान में भगवान के मत का अनुसरण नहीं करते, वह भी भविष्य में सत्संग आदि के प्रभाव से भगवान के मत का अनुसरण कर सकते हैं, जिनसे उनकी मुक्ति हो सकती है ।
गीता श्लोक 3/33
कर्म न करने से मनुष्य का पतन हो जाता है …..
संपूर्ण प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं । ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा ?
जितने भी कर्म किए जाते हैं, वे स्वभाव अथवा सिद्धांत को सामने रखकर किए जाते हैं। सिद्धांत वह है, जो शास्त्र और भगवान के अनुसार हो। शास्त्र और भगवान की आज्ञा के विपरीत सिद्धांत मान्य नहीं है। ज्ञानी पुरुष का स्वभाव शुद्ध होता है। वह प्रकृति के बस में नहीं होता। जिनका स्वभाव महान शुद्ध और श्रेष्ठ है, उनकी क्रियाएं भी अपनी प्रकृति के अनुसार हुआ करती हैं । फिर जिनका स्वभाव अशुद्ध है, उन पुरुषों की क्रियाएं तो प्रकृति के अनुसार ही होगी।
अर्जुन जब हठ पूर्वक युद्ध कर्तव्य कर्म का त्याग करना चाहते हैं । तब भगवान उन्हें यही कहते हैं कि तेरा स्वभाव तुझे बलपूर्वक तेरे क्षत्रियोचित कर्म अर्थात युद्ध में लगा देगा। क्योंकि तेरे स्वभाव में क्षत्रिय कर्म करने का प्रवाह है । इसलिए स्वाभाविक कर्मों से बना हुआ तू परवश होकर युद्ध करेगा अर्थात तेरा हठ काम नहीं आएगा।
श्रीमद्भगवद्गीता – कालीचरण राजपूत






