✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी
युवा मैनेजमेंट विश्लेषक एवं पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट
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“राष्ट्रमंडल संसदीय अध्यक्ष सम्मेलन में प्रधानमंत्री की दृष्टि और ओम बिरला के संसदीय नेतृत्व ने CSPOC को संवाद से नीति का मंच बनाया ”
हाल ही में भारत में आयोजित 28वें कॉमनवेल्थ राष्ट्रमंडल संसदीय अध्यक्ष सम्मेलन ने न केवल देश की संसदीय गरिमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ किया, बल्कि इस ऐतिहासिक आयोजन के केंद्र में लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला का नेतृत्व एक प्रेरक उदाहरण के रूप में उभरा।
यह सम्मेलन भारत के लिए कूटनीतिक और लोकतांत्रिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण रहा, उतना ही गौरवपूर्ण यह भी रहा कि इसकी मेजबानी और सफल संचालन की कमान एक ऐसे जनप्रतिनिधि के हाथों में रही, जिन्होंने संसदीय मर्यादा, संवाद और समन्वय को नई परिभाषा दी।सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका की सराहना विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की संसद आज वैश्विक लोकतांत्रिक संवाद का केंद्र बन रही है और इसमें लोकसभा अध्यक्ष की दूरदर्शिता, संतुलित नेतृत्व और संस्थागत प्रतिबद्धता की अहम भूमिका है।

प्रधानमंत्री का यह विश्वास कि “मजबूत संसदें ही मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला होती हैं” जो कि वस्तुतः ओम बिरला के संसदीय दृष्टिकोण का ही प्रतिबिंब है। राष्ट्रमंडल संसदीय अध्यक्ष एवं पीठासीन अधिकारी सम्मेलन जैसे उच्चस्तरीय अंतरराष्ट्रीय मंच पर ओम बिरला ने केवल एक मेजबान की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, संसदीय परंपराओं और समावेशी सोच को प्रभावी ढंग से विश्व समुदाय के समक्ष प्रस्तुत किया। विविध राजनीतिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक पृष्ठभूमियों से आए राष्ट्रमंडल देशों के स्पीकर्स और पीठासीन अधिकारियों के बीच संतुलित संवाद स्थापित करना एक जटिल कार्य था, जिसे उन्होंने सहजता और गरिमा के साथ संपन्न किया।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उद्घाटन भाषण में यह रेखांकित करना कि भारत लोकतंत्र का केवल सबसे बड़ा प्रयोग नहीं, बल्कि उसका जीवंत प्रयोगशाला भी है,इस बात का प्रमाण है कि भारत की संसदीय संस्थाएं आज वैश्विक दिशा तय करने की क्षमता रखती हैं।
इस दृष्टिकोण को मूर्त रूप देने में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका केंद्रीय रही। उनके नेतृत्व में यह सम्मेलन केवल विचार-विमर्श तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस,डिजिटल गवर्नेंस और विधायी सुरक्षा जैसे समकालीन विषयों पर ठोस और व्यावहारिक निष्कर्षों की ओर अग्रसर हुआ।ओम बिरला ने अपने संबोधनों में बार-बार इस तथ्य पर बल दिया कि संसदें केवल कानून निर्माण की संस्था नहीं हैं, बल्कि वे जनता की आकांक्षाओं, विश्वास और लोकतांत्रिक चेतना की संरक्षक होती हैं। तकनीक के युग में उन्होंने यह स्पष्ट दृष्टि रखी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल साधन लोकतंत्र को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बना सकते हैं, बशर्ते उनका उपयोग संवैधानिक मूल्यों और मानवीय विवेक के साथ किया जाए।

यह संतुलित सोच ही उन्हें एक परिपक्व और वैश्विक दृष्टि वाला पीठासीन अधिकारी बनाती है।सम्मेलन के दौरान डिजिटल गवर्नेंस पर हुई चर्चाओं में भारत के डिजिटल लोकतांत्रिक मॉडल की सराहना हुई, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका मार्गदर्शक के रूप में रही। ई-पार्लियामेंट, डिजिटल दस्तावेजीकरण और नागरिक सहभागिता को बढ़ाने वाले नवाचारों को उन्होंने भारत के अनुभवों से जोड़ते हुए प्रस्तुत किया। यह प्रधानमंत्री मोदी के “डिजिटल इंडिया” के दृष्टिकोण का ही विस्तार था, जिसे संसदीय स्तर पर ओम बिरला ने सशक्त आधार प्रदान किया।विधायी सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर भी लोकसभा अध्यक्ष का दृष्टिकोण स्पष्ट और दूरगामी रहा। उन्होंने आगाह किया कि आज लोकतंत्र के सामने खतरे केवल भौतिक नहीं, बल्कि साइबर, डिजिटल और सूचनात्मक भी हैं। संसदों की सुरक्षा का अर्थ केवल भवनों की सुरक्षा नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता और जनविश्वास की रक्षा भी है। इस विषय पर उनका संतुलित और व्यावहारिक मार्गदर्शन राष्ट्रमंडल संसदीय परिवार के लिए उपयोगी सिद्ध हुआ।राजस्थान के कोटा बूंदी संसदीय क्षेत्र से आने वाले ओम बिरला के लिए यह सम्मेलन व्यक्तिगत उपलब्धि से कहीं अधिक था। यह कोटा और पूरे राजस्थान के लिए गर्व का क्षण रहा कि यहां का जनप्रतिनिधि अंतरराष्ट्रीय संसदीय मंच पर भारत का नेतृत्व कर रहा है।

कोटा, जिसे देश शिक्षा के केंद्र के रूप में जानता है, आज लोकतांत्रिक नेतृत्व के संदर्भ में भी वैश्विक मानचित्र पर और अधिक सशक्त रूप से उभरा है ,भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बार-बार लोकसभा अध्यक्ष के साथ समन्वय और संस्थागत सम्मान को रेखांकित करना यह दर्शाता है कि कार्यपालिका और विधायिका के बीच स्वस्थ संतुलन ही भारत की लोकतांत्रिक शक्ति है। प्रधानमंत्री का ओम बिरला के प्रति विश्वास और सार्वजनिक प्रशंसा इस बात का प्रमाण है कि उनका नेतृत्व केवल औपचारिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने वाला है।सम्मेलन के समापन पर आगामी CSPOC की अध्यक्षता यूके हाउस ऑफ कॉमन्स के स्पीकर लिंडसे हॉयले को सौंपना भी ओम बिरला की कूटनीतिक परिपक्वता का परिचायक रहा। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भारत में स्थापित सहयोग, संवाद और साझेदारी की भावना आगे भी राष्ट्रमंडल संसदीय परिवार में बनी रहे। इस राष्ट्रमंडल संसदीय अध्यक्ष एवं पीठासीन अधिकारी सम्मेलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत आज वैश्विक लोकतांत्रिक विमर्श का केंद्र बन चुका है और इस उपलब्धि में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका ऐतिहासिक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और ओम बिरला के संसदीय मार्गदर्शन के समन्वय ने यह सिद्ध किया कि जब दृष्टि और संस्था एक साथ आगे बढ़ती हैं, तब लोकतंत्र केवल जीवित ही नहीं रहता, बल्कि निरंतर सशक्त होता है। पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट डॉ नयन प्रकाश गांधी का मानना है कि यह सम्मेलन एवं इसमें निभाई गई भूमिका आने वाले वर्षों में भारतीय संसद की वैश्विक पहचान का मजबूत आधार बनेगी और कोटा के प्रखर व्यक्तित्व लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला से निकली यह लोकतांत्रिक आवाज विश्व पटल पर भारत का मान निरंतर बढ़ाती रहेगी।






