श्री राम भगवा ध्वज भारत का गौरव और सामूहिक आस्था की नई लहर
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✍️ डॉ नयन प्रकाश गांधी पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट
अयोध्या सदियों से देश के मन और भावना का केंद्र रही है। यह केवल एक नगर नहीं, बल्कि एक विचारधारा है। यह रामराज्य का विचार है, जहां शासन धर्म के मार्गदर्शन में होता है। यहां शक्ति सीमाओं से नहीं, बल्कि नीति और करुणा से तय होती है। राम की अयोध्या हमें सिखाती है कि सत्ता का महत्व केवल शासन करना नहीं बल्कि सेवा करना है। जब धर्म शासन में आता है, तो न्याय, करुणा और दया शासन का आधार बनते हैं। इसलिए अयोध्या केवल धार्मिक आस्था की गढ़ नहीं बल्कि सांस्कृतिक नीति का प्रतीक भी है। लंबे संघर्ष और इंतजार के बाद जब राम मंदिर के शिखर पर भगवा ध्वज लहराया गया, तो ऐसा लगा मानो भारत की चेतना ने एक नई सांस ली हो। यह वह क्षण था जब इतिहास, संस्कृति और आधुनिकता ने एक साथ मिलकर भारत के गौरव को उजागर किया।भगवा रंग भारतीय आध्यात्मिकता का परिचायक है। यह किसी धार्मिक रंग से कहीं अधिक है। यह त्याग, संयम और परोपकार की भावना का प्रतीक है। जब यह रंग अयोध्या के आकाश में लहरा उठा, तो लग रहा था कि यह भारत का ऐसा संकल्प है जो अपनी असली पहचान से कभी समझौता नहीं करेगा। डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि यह भगवा ध्वज केवल प्रतीक नहीं बल्कि रघुकुल की मर्यादा, नीति और धर्म का प्रतिनिधि है। ध्वज पर अंकित कोविडार वृक्ष स्थिरता, संतुलन और आध्यात्मिक शक्ति का द्योतक है। जैसे कोई वृक्ष अपनी जड़ों से ऊर्जा प्राप्त करता है, वैसे ही भारत अपनी संस्कृति और सनातन मूल्यों से जीवन शक्ति लेता है। भगवा रंग उस समाज का प्रतिनिधित्व करता है जो केवल भौतिक शक्ति पर नहीं बल्कि नैतिक शक्ति पर चलता है। यहां धर्म व्यक्तिगत आस्था से आगे बढ़कर सामाजिक व्यवस्था की नींव बनता है।रामराज्य कोई कल्पनाशील कहानी नहीं है। यह शासन की वह सोच है जिसमें सत्ताधिकार सेवा का माध्यम होता है, न कि केवल सत्ता का केन्द्र। इस व्यवस्था में राजा धर्म का पालन करता है और प्रजा का अभिभावक होता है। आज जब पूरी दुनिया विकास और आधुनिकता की दौड़ में नैतिक मूल्यों को कम करने लगी है, तब रामराज्य का संदेश और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रगति तभी स्थायी होती है जब उसके साथ नीति, करुणा और संवेदना भी जुड़ी हों। भगवा ध्वज का फहराना हमें याद दिलाता है कि भारत केवल आर्थिक शक्ति नहीं बल्कि नैतिक शक्ति वाला राष्ट्र है। उसके विकास का आधार धर्म है, लेकिन यह धर्म संप्रदाय नहीं, बल्कि ऐसा नैतिक धर्म है जो सबके हित की बात करता है।अयोध्या का यह दृश्य केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी ऐतिहासिक था। राम मंदिर का निर्माण न केवल एक धार्मिक स्मारक है, बल्कि यह “आत्मनिर्भर भारत” की भावना से जुड़ा एक राष्ट्र निर्माण कार्य है। भगवा ध्वज का यह आरोहण ऐसे भारत का प्रतीक है जो अब आत्मविश्वास से भरा है और अपनी जड़ों से मजबूत होकर विश्व मंच पर अपनी अलग पहचान बना रहा है।आज जब अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर पर भगवा धर्मध्वज लहरा रहा है, तो उन सभी लोगों की याद आती है जिन्होंने इस आंदोलन को अपना जीवन समर्पित कर दिया। अशोक सिंघल, महंत अवैद्यनाथ, महंत रामचंद्र दास परमहंस, कल्याण सिंह अनेक ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक संघर्ष, तपस्या और त्याग किया है। आज के इस निर्णायक और गौरवशाली क्षण में उनकी आत्मा को अवश्य ही शांति और संतोष की अनुभूति हो रही होगी, क्योंकि उनका अटूट समर्पण अब सफल होता दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अयोध्या का यह आयोजन उस भारत की तस्वीर प्रस्तुत करता है जो केवल अपनी रक्षा में नहीं, बल्कि अपने विकास और आत्मप्रकाश में विश्वास रखता है। यह देश दुनिया को दिखा रहा है कि आध्यात्मिकता और विकास साथ-साथ चल सकते हैं। यहां धर्म पीछे नहीं, बल्कि आगे बढ़ने और समृद्धि के लिए प्रेरणा बनता है। यह धर्मध्वज आज हर भारतीय के दिल में आत्मगौरव, आत्मबल और आत्मसंयम का प्रतीक बनकर लहरा रहा है। आज केवल अयोध्या का आकाश ही नहीं झुका, बल्कि भारत का इतिहास, संस्कृति और सामूहिक चेतना भी एक स्वर में बोल उठी है कि अब भारत जाग चुका है और अपना रास्ता खुद बनाएगा।






