Saturday, April 18, 2026
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आरएसएस शताब्दी वर्ष, स्वयंसेवकों का पथ संचलन:स्वयंसेवकों पर पुष्प वर्षा कर स्वागत,भारत माता के जयघोष किए

वैशाली /गाजियाबाद (एनसीआर )आरएसएस की श्रीराम बस्ती ,शिवाजी नगर एवं वैशाली महानगर गाजियाबाद शाखा सदस्यों की सम्मिलित सहभागिता में संघ शताब्दी महोत्सव हुआ सम्पन्न

आरएसएस की श्रीराम बस्ती ,शिवाजी नगर एवं वैशाली महानगर शाखा सदस्यों की सम्मिलित सहभागिता में आज सेक्टर एक वैशाली महानगर कालोनी शाखा प्रांगड़ में आज प्रातः आठ बजे रविवार को भव्य संघ शताब्दी वर्ष एवं विजयादशमी उत्सव मनाया गया। मीडिया प्रवक्ता डॉ नयन प्रकाश गांधी ने बताया कि कार्यक्रम में मुख्य अतिथि ओम प्रकाश भारती बीएचयू एलुमनाई, मुख्य वक्ता विभाग संयोजक गाजियाबाद विभाग सामाजिक समरसता गतिविधि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं विशिष्ट अतिथि दिनेश विष्ट ,सह नगर संचालक शिवाजी नगर वैशाली आदि रहे ।

राम का आचरण घर में लगे चित्र में नहीं चरित्र में होना आवश्यक है-डॉ प्रियांक

मुख्य वक्ता डॉ प्रियांक शर्मा ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा ,उसकी उत्पति ,उसके महत्व पर प्रकाश डाला और स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा किहम वीर शिवा के वंशज है ,हमें त्यागी ,बलिदानी बनना है ,स्वय को स्वालंबी बनाए ,आत्मनिर्भर भारत की मुहिम में संलग्न हो ,भारतीय उत्पादों ,स्वदेश प्रेम की भावना को उन्होंने हर स्वयंसेवक में प्रतिस्थापित करने को कहा और सामाजिक समरसता ,जातियों के अहंकार भाव को समाप्त करना ,जातियों के गलत दृष्टिकोण को समाप्त करना , जातियों में व्याप्त कुरीतियों को खत्म करना उद्देश्य हर संघ के हर स्वयं सेवक का होना चाहिए ।

आज राम का आचरण चित्र के रूप में तो हर घर में है परंतु राम के चरित्र को हर मनुष्य परिवार के हर जन में भाई भाई में परिवार के हर सदस्य में प्रतिस्थापित समाहित करने की आवश्यकता है,तभी आगामी पीढ़ी परिवार का महत्व समाज सकेगी ,भारतीय संस्कृति का परिचायक सिद्ध हो सकेगी ।

डॉ. प्रियांक ने देश का अंतिम व्यक्ति के वंचित नहीं ,खुशहाल होने पर जोर डाला ,संघ के हर व्यक्ति को अपने आसपास वंचित वर्ग के प्रति सहानुभूति ,सहृदयता कार्य रूप में दिखाने की आवश्यकता है ताकि अपने व्यवहार से कोई निचला महसूस न हो ।साथ ही संघ हेतु शारीरिकसहयोग ,आपकी कार्यशैली से संघ की शक्ति को बढ़ाने पर जोर दिया ,स्वयं की चेतना को जागृत करने पर जोर दिया और बताया कि अब आजकल भारतीय परिवारों में आदर सम्मान ,अदब दिखावा मात्र रह गया है ,संघ की विचारधारा परिवार समाज जाति सम्प्रदाय को एक कर उनमें व्याप्त कुरीतियों को मिटा कर सभी को वसुधैव कुटुंब भारतीय संस्कृति में पिरोए रखने की है जो आने वाले विकसित नया आत्मनिर्भर भारत समुन्नत परिवार समुन्नत राष्ट्र की मांग है अन्यथा भारत में भारतीय संस्कृति का पतन हो गया तो विदेशी देशों ,अंग्रेजों का राज पुनः आ सकता है हम पुनः गुलाम देश बन सकते है ।इसलिए त्वरित प्रवाह से उच्च गति से संघ की कार्यशैली विचारधारा को परिवार के हर सदस्य में समाहित करने की आवश्यकता है ।

व्यक्तव्य के पश्चात पूरी ऊर्जा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में वैशाली महानगर सेक्टर एक से प्रारंभ विभिन्न स्थानों से होकर पथ संचलन का आयोजन किया गया। पूर्ण गणवेश में स्वयंसेवकों ने यह संचलन निकाला गया। पूरे सेक्टर में विभिन्न परिवारों द्वारा ,संस्थानों के प्रतिनिधियों द्वारा ,महिलाओं ,बच्चों ,पुरुषों ,बालिकाओं ,दुर्गावाहिनी द्वारा स्वागत वंदन किया गया फूलों से वर्षा की गई ,वैशाली सेक्टर एक स्थित ब्रह्मकुमारीज संस्थान की सभी दीदियों ने तिलक पुष्प से वंदन अभिनंदन किया ।विभिन्न स्कूलों के प्रतिनिधियों ने जमकर भारी संख्या में फूलों की वर्षा की ।

घोष दल के साथ कदमताल मिलाते हुए सैकड़ों स्वयंसेवकों की अनुशासित कतारें राष्ट्रभक्ति का संदेश दे रही थीं। इस दौरान स्वयंसेवकों पर पुष्प वर्षा कर उनका स्वागत किया गया। स्वयंसेवक ‘संगठन बढ़े चलो सुपथ पर बढ़े चलो’ जैसे संगठन गीत गाते हुए भारत माता के जयघोष कर रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा में असंख्य लोगों का सहयोग रहा है। उन्होंने इस यात्रा को परिश्रमपूर्ण और कुछ संकटों से घिरा बताया, लेकिन सामान्य जनों के समर्थन को इसका सुखद पक्ष कहा। उन्होंने ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से सामाजिक बदलाव की बात भी कही। इस कार्यक्रम में सुभाष शर्मा ,धीरेन्द्र कुमार सहित कई कार्यवाहक स्वयंसेवक और पदाधिकारी मौजूद रहे।

आइए जानते है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उत्पति और उद्वेश्य के बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन नागपुर, महाराष्ट्र में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। डॉ. हेडगेवार संघ के पहले सरसंघचालक थे, जिन्होंने सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से सनातन संस्कृति हिंदुत्व को संगठित व राष्ट्र निर्माण हेतु प्रेरित किया।

 

संघ के नाम को लेकर पहले “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ”, “जरी पटका मंडल”, और “भारत उद्धार मंडल” जैसे विकल्प सामने आए थे, जिनमें से ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम को सर्वसम्मति और बहुमत से चुना गया। संघ की शुरुआत नित्य शाखाओं और प्रशिक्षण शिविरों से हुई, जिससे इसके संगठन एवं विचारधारा का प्रचार-प्रसार हुआ। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के नेतृत्व में संघ ने अनुशासन, सेवा और राष्ट्रीय भावना से प्रेरित कार्यशैली अपनाई, जिसका उद्देश्य समाज को संगठित करना तथा देश में राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत करना था।

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