कोटा/ श्री राजाराम कर्मयोगी एक ऐसे व्यक्ति का नाम है,जो अपनी थाली में से निवाला निकाल कर किसी गरीब को खिलाने से संतुष्ट होता है। उन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। वह कोटा शहर में दीन दुखियों के मसीहा बन चुके हैं। किसी भी लावारिश शव का विधि विधान से अंतिम संस्कार कराते हैं। मां गंगा के पवित्र जल में अस्थि विसर्जन तक की प्रक्रिया निस्वार्थ भाव से करना श्री राजाराम कर्म योगी जैसे व्यक्तित्व का ही कार्य हो सकता है। उनका मानना है कि व्यक्ति का स्वभाव ही उसका परिचय है। इस लोकोक्ति को उन्होंने अपने कार्य
से सार्थक कर दिखाया है। ऐसे महात्मा पुरुष का पिछले 20 वर्षों से मुझे सानिध्य मिला है। साहित्य के क्षेत्र में रचनाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए लेखकों और कवियों को सम्मानित करना जैसे कार्य में मैंने उनके साथ कदम से कदम मिला कर सहभागिता निभाई है।
श्री कर्मयोगी साहित्य सेवा संस्थान के माध्यम
से 375 लेखक एवं कवियों को सम्मानित करने में मैंने प्रेम शास्त्री और महेश पंचोली ने उनका सहयोग किया है। संस्थान द्वारा निकाली जा रही स्मारिका में भी भागीदारी करने का मुझे सौभाग्य मिला है। जिसमें हमने कोटा के लेखक,कवि एवं साहित्यकार,रचनाकारों का परिचय दिया है। स्मारिका में कलाकारों,लोक नृत्य
कलाकारों,लोक गीतकारों को शामिल किया गया है।किसी भी व्यक्ति या शोधार्थी को उनके बारे में संक्षिप्त आवश्यक जानकारी मिल जाएगी। उन्होंने कलाकारों, साहित्यकारों, नर्सों, अग्निशमन कर्मचारियों, मस्जिदों के इमामों, नगर निगम के गोताखोरों घरों में काम करने वाली वाइयों एवं और ख्याति प्राप्त उत्कृष्ट व्यक्तियों का सम्मान किया है,जिसके लिए वह धन्यवाद के पात्र हैं।
राजाराम कर्मयोगी लावारिसों के अंतिम संस्कार के लिए वांछित सामग्री का निशुल्क प्रबंध तो करते ही हैं, साथ ही वह एक ऐसे कलाकार हैं जो कोटा की रामलीला में रावण का किरदार भी निभाते हैं। शिद्दत से उसे अंजाम देते हैं। दर्शक और आयोजक दोनों ही उनके काम के प्रशासक हैं। सम्मेद पर्वत शिखर को छत्तीसगढ़ की सरकार ने पर्यटन के रूप में विकसित करने का प्रयास किया तो वह चुप नहीं बैठे। समाज बंधुओं को साथ लेकर कोटा जिलाधीश श्री ओपी.बुनकर के पास पहुंच गए। उन को ज्ञापन दिया। वह भी रावण की वेशभूषा में। राजाराम कर्मयोगी को रावण के गणवेश में देखकर जिलाधीश खुश हुए। प्रसन्नता के साथ उन्होंने ज्ञापन स्वीकार किया। वादा किया कि प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति जी के पास ज्ञापन को अवश्य भेजेंगे।
राजस्थान के मुख्यमंत्री ने भीख मांगने वाले या रात में फुटपाथ पर,सड़कों पर सोने वाले निशक्त जनों, वृद्धजनों, प्लास्टिक की पन्नियां बीन कर गुजारा करने वालों के लिए एक योजना बनाई कि इन सब का पुनर्वास किया जाए। उन्हें समझाया जाए, प्रेरित किया जाए कि वे भिक्षावृत्ति छोड़ कर सम्मान जनक जीवन जीने के मार्ग पर आगे बढ़ें। जीवन की मुख्य धारा में आ जाएं। सरकार आर्थिक सहायता देगी। इस कार्य को मूर्तरूप देने के लिए जिलाधीश ने श्री राजाराम कर्मयोगी को ही चुना। शहर को भिक्षावृत्ति मुक्त करने और उस पर लगाम लगाने का दायित्व उन्हें सोंपा। राजाराम कर्मयोगी और उनकी टीम ने भिखारियों का पंजीकरण कर चिन्हित किया। इसके बाद उनका पुनर्वास कराया। यह एक अनुकरणीय उदाहरण है। हर कोई ऐसे कार्य नहीं कर पाता है।
कोटा में राजाराम कर्मयोगी को अंतिम संस्कार पथ की यात्रा के सारथी के रूप में जाना जाता है। रावण की भूमिका निभाने के कारण उन्होंने अपना नाम रावण सरकार रखा। 12 मण लकड़ी की चिता बनाकर वर्ष 2012 में चिता पर विवाह रचाते हुए वरमाला के सात फेरों के स्थान पर 12 फेरे लेकर 12 संकल्पों के साथ जीवन जीने का निश्चय किया। राजाराम कर्मयोगी ने संसार में रहकर सांसारिक मोह का त्याग कर दिया।वंशवाद की परंपरा को तोड़ते हुए संतान को जन्म नहीं देने,सोना नहीं पहनने,राजनीति नहीं करने,किसी सामाजिक संस्था से सम्मान नहीं लेने,देह त्यागने के बाद देहदान,मृत्यु भोज ग्रहण न करना जैसे कठोर संकल्पों का बहुत ही सहजता से पालन करते हुए,वर्ष 2000 से देश दुनिया की समस्त दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए श्राद्ध तर्पण करा रहे हैं। संस्था संस्थापक अध्यक्ष राजाराम कर्मयोगी द्वारा वर्ष 2007 से अब तक 6317 गरीब असहाय एवं लावारिस शवों का अंत्येष्टि कार्यक्रम कराया है। उनकी अस्थियों को विधि विधान के साथ हरिद्वार जा कर विसर्जित किया है। संस्थान द्वारा शहर में दाह संस्कार से संबंधित12 दिन तक की संपूर्ण,व्यवस्था फोन पर ही उपलब्ध करवा दी जाती है। असहाय व्यक्तियों का अंतिम संस्कार कराने के लिए किसी तरह की धनराशि नहीं ली जाती है।
अंतिम संस्कार की सामग्री,शव वाहन,एंबुलेंस आदि की सुविधाएं निशुल्क उपलब्ध करवाई जा रही है।अब तक सक्षम परिवारों में भी 70,000 से अधिक दिवंगत आत्माओं के लिए अंतिम संस्कार की व्यवस्था की है। राजाराम कर्मयोगी का विगत वर्षों का अनुभव है कि कोटा में प्रतिदिन करीब 15 से 20 व्यक्तियों का देहांत होता है। कोटा में 85 शव दाह गृह एवं 35 कब्रिस्तान हैं। जिनमें अंतिम संस्कार की व्यवस्थाओं में 80% शहरवासी कर्मयोगी सेवा संस्थान की सेवाएं प्राप्त करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि संस्थान दाह संस्कार से लेकर के 12 दिन तक के संपूर्ण क्रिया कर्म की व्यवस्था फोन पर ही उपलब्ध करता है।
“दुख में हमें याद करें” इस आदर्श वाक्य के साथ 3 सितंबर 2007 से शहर में अंत्येष्टि कार्यक्रम की शुरुआत करने वाली प्रदेश की यह एक मात्र संस्था है। जिसे राजनेताओं, गुणमान्य नागरिकों,शिक्षाविदों, इंजीनियरों,प्रशासकों आदि सभी तबकों का आशीर्वाद प्राप्त है। राजाराम कर्मयोगी बताते हैं कि हाड़ौती क्षेत्र से 50% से भी अधिक व्यक्ति केशोरायपाटन के पवित्र घाट पर पतित पावनी चंबल नदी में अस्थि विसर्जन करते हैं। हाड़ौती अंचल के लोग मां चंबल को गंगा नदी के समान ही पवित्र मानते हैं। कोरोना त्रासदी के समय देश ही नहीं वरन् विदेशों से भी लोग, कर्मयोगी सेवा संस्थान को गूगल पर सर्च करते थे। फोन कर के दिवंगत परिजनों के लिए अविलंब सेवाएं प्राप्त की हैं। ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी संसार में बहुत कम लोग होते हैं, जो अपने कार्यों से समाज और देश को प्रभावित करते हैं। लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ जाते हैं।उनमें से राजाराम कर्मयोगी एक हैं।

✍️ रघुराज सिंह कर्मयोगी
आलेख अप्रकाशित एवं मौलिक है।






