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भारत विभाजन 1947 की विभीषिका
विस्तृत भारत एक था, तेहिं किए दो भाग ।
लूट पाट भी खूब की, खूब लगाई आग ।।
माउंट वेटन मुख्य था, इसने रखी नींव ।
पीड़ा इतनी दे गया, बहने लागा पीव ।।
मारा काटा खूब ही, बचा न पाए जान ।
पाक रहे, दुश्मन बने, भारत में मेहमान ।।
दोनों में अंतर साफ था, अलग बनी पहचान ।।
एक निवासी बन गया, एक रहा मेहमान ।।
बदलाव घृणा से भरा, बहुत गईं थी जान ।
अगणित जान गवा गए, हो न सकी पहचान ।।
हवाएं बदबू से भरी, बिगड़ा था माहौल ।
घृणा इतनी भर गई, डील रहना डौल ।।
जो देखा मारा गया, बचा न पाया प्रान ।
जहां देखे वहां शव दिखे, इतनी सस्ती जान ।।
अगस्त 47 के वर्ष में, नए बन गए देश।
एक से तीन, होत ही, आ गई नई क्लेश ।।
तब से दोनों की मित्रता, ले न सकी मुकाम ।
कुछ लोग तो प्रसन्न थे, दुखी रही आवाम ।।
जिसको पाना पा लिया, दुखित रहे सब लोग ।
कुछ तो अपने भाग से, भोग रहे हैं भोग ।।
आज तो वैसा है नहीं, सुधर रहे हालात ।
अब कोई दुश्मन नहीं, आपस में पूछें बात ।।
गृह विहीन घर पा रहे, रोगी को आरोग ।
दया दृष्टि सरकार की, भगा रही है रोग ।।
भगा रही है रोग…
भगा रही है रोग….
कवि कालीचरण राजपूत

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