Wednesday, February 25, 2026
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श्रीम‌द्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 17/16..

मन का तप…

भगवान कहते हैं की मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह और भावों की भली-भांति शुद्धि, इस तरह यह, मन संबंधी तप कहा जाता है ।

मन की प्रसन्नता को “मनह प्रसाद” कहते हैं । हर उत्पत्ति वाली वस्तु, सत्य रूप से हरदम नहीं रहती, क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका विनाश भी होता है, परंतु दुर्गुण, दुराचारों से संबंध विच्छेद, सदा सुख देने वाला होता है । जब मनुष्य नाशवान वस्तुओं का सहारा लेता है, तब उसका वियोग होता है, तब तकलीफ होती है । मन की सुख और शांति के साधन _ _

एक_ किसी भी वस्तु को लेकर मन में राग़ या द्वेष पैदा न करें ।

दो _ अपने कर्तव्य में स्वार्थ और अभिमान का सहारा न लें ।

तीन _मन में दया,क्षमा और उदारता के भाव रख कर, प्रत्येक प्राणी के लिए हित का भाव रखें ।

गीता श्लोक 17/17…

सात्विक तप क्या है ?

भगवान कहते हैं कि परम श्रद्धा से युक्त,फल की इच्छा से रहित, मनुष्यों के द्वारा जो तीन प्रकार शरीर, वाणी, और मन का तप किया जाता है, उसको “सात्विक तप” कहते हैं ।

भगवान कहते हैं कि शरीर, वाणी, और मन के द्वारा जो तप किया जाता है, वह तप ही मनुष्यों का सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य है और यही मानव जीवन के उद्देश्य की पूर्ति का अचूक उपाय है तथा इसको सांगों पाँग (अर्थात पूरी तरह से) एवं अच्छी तरह से करने पर मनुष्य के लिए कुछ करना बाकी नहीं रहता । आदर पूर्वक तप का आचरण करना ही परम श्रद्धा से युक्त मनुष्यों द्वारा उस तप को करना है ।

गीता श्लोक 17/18..

राजस तप का फल…

भगवान कहते हैं कि जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा दिखाने के भाव से भी किया जाता है, वह इस लोक में अनिश्चित और नाशवान फल देने वाला तप “राजस” कहलाता है ।

राजस मनुष्य तो केवल सत्कार मान और पूजा के लिए ही तप किया करते हैं । वह सोचते हैं कि जहां भी हम जाएंगे, वहां हमें तपस्वी समझकर लोग हमारी अगवानी अर्थात स्वागत करेंगे, आसपास के क्षेत्र में हमारी सवारी अर्थात स्वागत रथ निकालेंगे, जगह-जगह लोग हमें बैठने के लिए आसन भी देंगे, हमारे नाम का जय घोष बार-बार करेंगे, हमसे मीठा बोलेंगे, अभिनंदन पत्र सौंपेंगे आदि कर्म करेंगे ।

राजस का फल चल और अध्रुव अर्थात स्थिर न रहने वाला रहता है । इसका फल नाशवान होता है, जो केवल दिखावटी पन के लिए किया जाता है, उसका फल अनिश्चित कहा गया है ।

गीता श्लोक 17/19…

तामस राव क्या है?….

भगवान कहते हैं कि जो तप मूढ़ता पूर्वक किया जाता है उसे अपने को पीड़ा देकर अथवा दूसरों को कष्ट देने के लिए किया जाता है, वह “तामस तप” कहा जाता है ।

तामस तप में मूढ़ता पूर्वक आग्रह होने से अपने _आप को पीड़ा देकर तप किया जाता है । तामस मनुष्यों में मूढ़ता की प्रधानता रहती है । अतः जिसमें शरीर को, मन को, कष्ट हो उसको ही “तप” मानते हैं । यह भी हो सकता है कि तामसी मनुष्य दूसरों को कष्ट देने के लिए “तप” करते हों । उनका भाव यह भी रहता है कि शक्ति प्राप्त करने के लिए तप करने में मुझे भले ही कष्ट सहना पड़े, परंतु दूसरों को तो बर्बाद करना ही है । वे दूसरों को कष्ट देने के लिए मनमाने ढंग से उपवास करते हैं । शीत, धूप सहकर भी तप करते हैं, इसमें उनका ईश्वरीय भाव नहीं है, वरन मूढ़ता है ।

गीता श्लोक 17/21..

राजस दान….

भगवान कहते हैं कि जो दान क्लेश पूर्वक और प्रति उपकार के लिए अथवा फल प्राप्त का उद्देश्य बनाकर दिया जाता है, वह दान “राजस दान”कहा जाता है।

बदला प्राप्त करने के लिए जो दान दिया जाता है उसे राजस दान कहते हैं । इस प्रकार प्रतिफल की कामना रखकर अथवा इस लोक के साथ संबंध जोड़कर जो दान दिया जाता है, वह दान प्रति उपकार वाला दान कहा जाता है । फल का उद्देश्य रखकर अर्थात परलोक के साथ अपना संबंध बनाकर जो दान दिया जाता है, उसमें भी राजस मनुष्य, देश काल और पात्र को देखा है और शास्त्रीय विधि विधान को देखा है, परंतु इस प्रकार दान करने पर भी, फल की कामना होने से, यह दान राजस हो जाता है ।

गीता श्लोक 17,/22…

तामस दान..

भगवान कहते हैं कि जो दान बिना सत्कार के तथा अवज्ञा पूर्वक, अयोग्य आदमी को, आरोग्य स्थान और अयोग्य काल में, अपात्र को दिया जाता है, वह दान “तामस” कहा जाता है ।

जो दान असत्कार पूर्वक और अवज्ञा पूर्वक दिया जाता है एवं शास्त्र विधि का ध्यान न रखते हुए ब्राह्मण का तिरस्कार करते हुए, दिया जाता है, वह दान “तामस” दान कहलाता है । मूर्खता के कारण, मूर्ख मनुष्य को, केवल अपने मन की बातें अच्छी लगती हैं । इस प्रकार तामस मनुष्य शास्त्र विधि का अनादर करता है और तिरस्कार करके दान देता है । तामस दान अपात्र पुरुष को दिया जाता है । तरह_ तरह का तर्क_ वितर्क करके पात्र पुरुष का विचार नहीं करते और दान उसे दे देते हैं, जिससे अपना स्वार्थ सिद्ध हो। तामस कर्म का फल अधोगति बताया है । परंतु रामचरितमानस में कहा गया है कि “दान किसी प्रकार से देने से, दान देने वाले का, कल्याण ही होता है” _

“येन केन विधि दीने, दान करइ कल्याण” ।

गीता श्लोक 17/23…

वेदों और ब्राह्मणों की रचना….

 

भगवान कहते हैं कि ओम, तत सत _इन तीन प्रकार के नाम से परमात्मा का निर्देश अर्थात संकेत किया गया है । उसी परमात्मा से सृष्टि के “आदि” में वेदों तथा ब्राह्मण और यज्ञों की रचना हुई है ।

परमात्मा का तीन प्रकार का निर्देश है कि ओम तत् और सत अर्थात् परमात्मा के तीन नाम हैं । उस परमात्मा ने पहले अर्थात सृष्टि के आरंभ में वेदों, ब्राह्मणों और यज्ञों को बनाया । इन तीनों में विधि बताने वाले वेद हैं । अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण हैं और क्रिया करने के लिए यज्ञ हैं ।अब इनमें यज्ञ, तप, दान आदि की क्रियायो में कोई कमी रह जाए, तो क्या करें? तब परमात्मा का बार-बार नाम लेलें तो, यह कमी पूरी हो जाएगी ।कोई निष्काम भाव से यज्ञ दान आदि शुभ कर्म करे और उनमें यदि कोई कमी रह जाए तो, जिस भगवान के लिए यज्ञ किया गया है, उस भगवान का बार-बार नाम लेने से अवगुण या दुर्गुण दूर हो जाते हैं।

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